महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘गोविन्द! आज इस युद्धमें मैं तीनों लोकोंद्वारा सम्मानित हो गया। अनघ! मैं आपका दास हूँ। आप अपनी इच्छाके अनुसार मुझपर प्रहार कीजिये’।। ६६ १/२ ।। अन्वगेव ततः पार्थः समभिद्रुत्य केशवम् ।। ६७ ।। निजग्राह महाबाहुर्बाहुभ्यां परिगृह्य वै । इधर महाबाहु अर्जुन श्रीकृष्णके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे उन्हें पकड़कर काबूमें कर लिया ।। ६७ १/२ ।। निगृह्यमाणः पार्थेन कृष्णो राजीवलोचनः ।। ६८ ।। जगामैवैनमादाय वेगेन पुरुषोत्तमः । अर्जुनके द्वारा पकड़े जानेपर भी कमलनयन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें लिये-दिये ही वेगपूर्वक आगे बढ़ने लगे ।। ६८ १/२ ।। पार्थस्तु विष्टभ्य बलाच्चरणौ परवीरहा ।। ६९ ।। निजग्राह हृषीकेशं कथंचिद् दशमे पदे । तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने बलपूर्वक भगवान्के चरणोंको पकड़ लिया और इस प्रकार दसवें कदमतक जाते-जाते वे किसी प्रकार हृषीकेशको रोकनेमें सफल हो सके ।। ६९ १/२ ।। तत एवमुवाचार्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणम् ।। ७० ।। निःश्वसन्तं यथा नागमर्जुनः प्रणयात् सखा । निवर्तस्व महाबाहो नानृतं कर्तुमर्हसि ।। ७१ ।। उस समय श्रीकृष्णके नेत्र क्रोधसे व्याप्त हो रहे थे और वे फुफकारते हुए सर्पके समान लम्बी साँस खींच रहे थे। उनके सखा अर्जुन आर्तभावसे प्रेमपूर्वक बोले—‘महाबाहो! लौटिये, अपनी प्रतिज्ञाको झूठी न कीजिये ।। ७०-७१ ।। यत् त्वया कथितं पूर्वं न योत्स्यामीति केशव । मिथ्यावादीति लोकास्त्वां कथयिष्यन्ति माधव ।। ७२ ।। ‘केशव! आपने पहले जो यह कहा था कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ उस वचनकी रक्षा कीजिये। अन्यथा माधव! लोग आपको मिथ्यावादी कहेंगे ।। ७२ ।। ममैष भारः सर्वो हि हनिष्यामि पितामहम् । शपे केशव शस्त्रेण सत्येन सुकृतेन च ।। ७३ ।। ‘केशव! यह सारा भार मुझपर है। मैं अपने अस्त्र-शस्त्र, सत्य और सुकृतकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पितामह भीष्मका वध करूँगा ।। ७३ ।। अन्तं यथा गमिष्यामि शत्रूणां शत्रुसूदन । अद्यैव पश्य दुर्धर्षं पात्यमानं महारथम् ।। ७४ ।। तारापतिमिवापूर्णमन्तकाले यदृच्छया ।