महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2209, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण अथवा पाण्डुपुत्र धनंजयके सिवा दूसरे किसीको जगत्में ऐसा नहीं देखता, जो युद्धके लिये उद्यत होनेपर मुझे मार सके ।। ८५ १/२ ।। एष तस्मात् पुरोधाय कञ्चिदन्यं ममाग्रतः ।। ८६ ।। आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुकः । मां पातयतु बीभत्सुरेवं तव जयो ध्रुवम् ।। ८७ ।। इसलिये यह अर्जुन श्रेष्ठ धनुष तथा दूसरे अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्धमें सावधानीके साथ प्रयत्नशील हो और उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त किसी पुरुषको अथवा शिखण्डीको मेरे सामने खड़ा करके स्वयं बाणोंद्वारा मुझे मार गिरावे। इसी प्रकार तुम्हारी निश्चितरूपसे विजय हो सकती है ।। ८६-८७ ।। एतत् कुरुष्व कौन्तेय यथोक्तं मम सुव्रत । संग्रामे धार्तराष्ट्रांश्च हन्याः सर्वान् समागतान् ।। ८८ ।। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! तुम मेरे ऊपर जैसे मैंने बतायी है, वैसी ही नीतिका प्रयोग करो। ऐसा करके ही तुम रणक्षेत्रमें आये हुए सम्पूर्ण धृतराष्ट्रपुत्रों एवं उनके सैनिकोंको मार सकते हो ।। ८८ ।।
संजय उवाच
ते तु ज्ञात्वा ततः पार्था जग्मुः स्वशिबिरं प्रति । अभिवाद्य महात्मानं भीष्मं कुरुपितामहम् ।। ८९ ।। संजय कहते हैं— राजन्! यह सब जानकर कुन्तीके सभी पुत्र कुरुकुलके वृद्ध पितामह महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरकी ओर चले गये ।। तथोक्तवति गाङ्गेये परलोकाय दीक्षिते । अर्जुनो दुःखसंतप्तः सव्रीडमिदमब्रवीत् ।। ९० ।। गंगानन्दन भीष्म परलोककी दीक्षा ले चुके थे। उन्होंने जब पूर्वोक्त बात बतायी, तब अर्जुन दुःखसे संतप्त एवं लज्जित होकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ।। ९० ।। गुरुणा कुरुवृद्धेन कृतप्रज्ञेन धीमता । पितामहेन संग्रामे कथं योद्ध्वास्मि माधव ।। ९१ ।। ‘माधव! कुरुकुलके वृद्ध गुरुजन विशुद्ध-बुद्धि, मतिमान् पितामह भीष्मसे मैं रणक्षेत्रमें कैसे युद्ध करूँगा ।। ९१ ।। क्रीडता हि मया बाल्ये वासुदेव महामनाः । पांसुरूषितगात्रेण महात्मा परुषीकृतः ।। ९२ ।। ‘वासुदेव! बचपनमें खेलते समय मैंने अपने धूलि-धूसर शरीरसे उन महामनस्वी महात्माको सदा दूषित किया है ।। ९२ ।। यस्याहमधिरुह्याङ्कं बालः किल गदाग्रज ।