महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2210, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतातेत्यवोचं पितरं पितुः पाण्डोर्महात्मनः ॥ ९३ ॥ नाहं तातस्तव पितुस्तातोऽस्मि तव भारत । इति मामब्रवीद् बाल्ये यः स वध्यः कथं मया ॥ ९४ ॥ ‘गदाग्रज! कहते हैं, मैं बचपनमें अपने पिता महात्मा पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मजीकी गोदमें चढ़कर जब उन्हें तात कहकर पुकारता था, उस समय उस बाल्यावस्थामें ही वे मुझसे इस प्रकार कहते थे—‘भरतनन्दन! मैं तुम्हारा तात नहीं, तुम्हारे पिताका तात हूँ।' वे ही वृद्ध पितामह मेरे द्वारा मारनेयोग्य कैसे हो सकते हैं? ॥ ९३-९४ ॥ कामं वध्यतु सैन्यं मे नाहं योत्स्ये महात्मना । जयो वास्तु वधो वा मे कथं वा कृष्ण मन्यसे ॥ ९५ ॥ ‘भले ही वे मेरी सेनाका नाश कर डालें, मेरी विजय हो अथवा मृत्यु; परंतु मैं उन महात्मा भीष्मके साथ युद्ध नहीं करूँगा; अथवा श्रीकृष्ण! आप कैसा ठीक समझते हैं? ॥ ९५ ॥ (कथमस्मद्विधः कृष्ण जानन् धर्मं सनातनम् । न्यस्तशस्त्रे च वृद्धे च प्रहरेद्धि पितामहे ॥) ‘श्रीकृष्ण! अपने सनातन धर्मको जाननेवाला मेरे-जैसा पुरुष हथियार डालकर बैठे हुए अपने बूढ़े पितामहपर प्रहार कैसे करेगा?'
वासुदेव उवाच
प्रतिज्ञाय वधं जिष्णो पुरा भीष्मस्य संयुगे । क्षत्रधर्मे स्थितः पार्थ कथं नैनं हनिष्यसि ॥ ९६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—विजयी कुन्तीकुमार! तुम क्षत्रियधर्ममें स्थित हो। युद्धमें तुम पहले भीष्मके वधकी प्रतिज्ञा करके अब उन्हें कैसे नहीं मारोगे? ॥ ९६ ॥ पातयैनं रथात् पार्थ क्षत्रियं युद्धदुर्मदम् । नाहत्वा युधि गाङ्गेयं विजयस्ते भविष्यति ॥ ९७ ॥ पार्थ! तुम युद्धदुर्मद क्षत्रियप्रवर भीष्मको रथसे मार गिराओ। रणक्षेत्रमें गंगानन्दन भीष्मको मारे बिना तुम्हारी विजय नहीं होगी ॥ ९७ ॥ दृष्टमेतत् पुरा देवैर्गमिष्यति यमक्षयम् । यद् दृष्टं हि पुरा पार्थ तत् तथा न तदन्यथा ॥ ९८ ॥ इस बातको देवताओंने पहलेसे ही देख रखा है। भीष्म इसी प्रकार यमलोकको जायँगे। पार्थ! जिसे देवताओंने देखा है, वह उसी प्रकार होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता ॥ ९८ ॥ न हि भीष्मं दुराधर्षं व्यात्ताननमिवान्तकम् । त्वदन्यः शक्नुयाद् योद्धुमपि वज्रधरः स्वयम् ॥ ९९ ॥