भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2211

दुर्धर्ष वीर भीष्म मुँह फैलाये हुए कालके समान प्रतीत होते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई, भले ही वह साक्षात् वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उनके साथ युद्ध नहीं कर सकता ॥ ९९ ॥

जहि भीष्मं स्थिरो भूत्वा शृणु चेदं वचो मम ।
यथोवाच पुरा शक्रं महाबुद्धिर्बृहस्पतिः ॥ १०० ॥
अर्जुन! तुम स्थिर होकर भीष्मको मारो और मेरी यह बात सुनो, जिसे पूर्वकालमें महाबुद्धिमान् बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको बताया था ॥ १०० ॥

ज्यायांसमपि चेद् वृद्धं गुणैरपि समन्वितम् ।
आततायिनमायान्तं हन्याद् घातकमात्मनः ॥ १०१ ॥
कोई बड़े-से-बड़े गुरुजन, वृद्ध और सर्वगुणसम्पन्न पुरुष ही क्यों न हों, यदि शस्त्र उठाकर अपना वध करनेके लिये आ रहे हों तो उस आततायीको अवश्य मार डालना चाहिये ॥ १०१ ॥

शाश्वतोऽयं स्थितो धर्मः क्षत्रियाणां धनंजय ।
योद्धव्यं रक्षितव्यं च यष्टव्यं चानसूयुभिः ॥ १०२ ॥
धनंजय! यह क्षत्रियोंका निश्चित सनातन धर्म है। उन्हें किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखकर सदा युद्ध, प्रजाओंकी रक्षा और यज्ञ करते रहने चाहिये ॥ १०२ ॥

अर्जुन उवाच

शिखण्डी निधनं कृष्ण भीष्मस्य भविता ध्रुवम् ।
दृष्ट्वैव हि सदा भीष्मः पाञ्चाल्यं विनिवर्तते ॥ १०३ ॥
अर्जुनने कहा— श्रीकृष्ण! शिखण्डी निश्चय ही भीष्मकी मृत्युका कारण होगा; क्योंकि भीष्म उस पांचाल-राजकुमारको देखते ही सदा युद्धसे निवृत्त हो जाते हैं ॥

ते वयं प्रमुखे तस्य पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
गाङ्गेयं पातयिष्याम उपायेनेति मे मतिः ॥ १०४ ॥
अतः हम सब लोग उनके सामने शिखण्डीको खड़ा करके शस्त्रप्रहाररूप उपायद्वारा गंगानन्दन भीष्मको मार गिरायेंगे, यही मेरा विचार है ॥ १०४ ॥

अहमन्यान् महेष्वासान् वारयिष्यामि सायकैः ।
शिखण्ड्यपि युधां श्रेष्ठं भीष्ममेवाभियोधयेत् ॥ १०५ ॥
मैं बाणोंद्वारा अन्य महाधनुर्धरोंको रोकूँगा। शिखण्डी भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्मके साथ ही युद्ध करे ॥ १०५ ॥

श्रुतं हि कुरुमुख्यस्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ।
कन्या ह्येषा पुरा भूत्वा पुरुषः समपद्यत ॥ १०६ ॥