भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2296, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2296

विधूय तान् बाणगणान् ये मुक्ताः पार्थिवोत्तमैः ॥ ४८ ॥ पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहत वरूथिनीम् । परंतु उदारचेता भीष्म उन श्रेष्ठ राजाओंके छोड़े हुए समस्त बाणसमूहोंका नाश करके पाण्डवोंकी विशाल सेनामें घुस गये ॥ ४८ १/२ ॥ चक्रे शरविघातं च क्रीडन्निव पितामहः ॥ ४९ ॥ नाभिसंधत्त पाञ्चाल्ये स्मयमानो मुहुर्मुहुः । स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्कृत्य भीष्मो बाणात् शिखण्डिने ॥ ५० ॥ वहाँ पितामह भीष्म खेल-सा करते हुए अपने बाणोंद्वारा पाण्डवसैनिकोंके अस्त्र-शस्त्रोंका विनाश करने लगे। परंतु शिखण्डीके स्त्रीत्वका स्मरण करके वे बारंबार मुसकराकर रह जाते थे; उसपर बाण नहीं चलाते थे ॥ ४९-५० ॥ जघान द्रुपदानीके रथान् सप्त महारथः । ततः किलकिलाशब्दः क्षणेन समभूत् तदा ॥ ५१ ॥ मत्स्यपाञ्चालचेदीनां तमेकमभिधावताम् । महारथी भीष्मने द्रुपदकी सेनाके सात रथियोंको मार डाला। तब एकमात्र भीष्मपर धावा करनेवाले मत्स्य, पांचाल और चेदिदेशके योद्धाओंका महान् कोलाहल क्षणभरमें वहाँ गूँज उठा ॥ ५१ १/२ ॥ ते नराश्वरथव्रातैर्मार्गणैश्च परंतप ॥ ५२ ॥ तमेकं छादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम् । भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तं रणे रिपून् ॥ ५३ ॥ परंतप! जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार उन वीरोंने पैदल, घुड़सवार तथा रथियोंके समुदायसे एवं बहुसंख्यक बाणोंद्वारा भीष्मको आच्छादित कर दिया। उस समय गंगानन्दन भीष्म अकेले युद्धके मैदानमें शत्रुओंको अत्यन्त संतप्त कर रहे थे ॥ ५२-५३ ॥ ततस्तस्य च तेषां च युद्धे देवासुरोपमे । किरीटी भीष्ममागच्छत् पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥ ५४ ॥ तदनन्तर भीष्म तथा उन योद्धाओंमें देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध होने लगा। इसी बीचमें किरीटधारी अर्जुन शिखण्डीको आगे करके भीष्मके समीप जा पहुँचे ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मपराक्रमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मपराक्रमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं।]