भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2299

द्रोणश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः । भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तस्तथैव च ।। १५ ।। सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः । तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महारथाः ।। १६ ।। अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादयन्तश्च पाण्डवम् । भीष्मके धनुषका काटा जाना कौरव महारथियोंको सहन नहीं हुआ। द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त—ये सात महारथी अत्यन्त क्रुद्ध हो किरीटधारी अर्जुनकी ओर दौड़े तथा अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनको अत्यन्त क्रोधपूर्वक बाणोंसे आच्छादित करने लगे ।। १४—१६ १/२ ।। तेषामापततां शब्दः शुश्रुवे फाल्गुनं प्रति ।। १७ ।। उद्वृत्तानां यथा शब्दः समुद्राणां युगक्षये । अर्जुनके प्रति आक्रमण करते हुए उन वीरोंका सिंहनाद उसी प्रकार सुनायी पड़ा, जैसे प्रलयकालमें अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़नेवाले समुद्रोंकी भीषण गर्जना सुनायी पड़ती है ।। १७ १/२ ।। घ्नतानयत गृह्णीत विद्ध्यध्वमवकर्तत ।। १८ ।। इत्यासीत् तुमुलः शब्दः फाल्गुनस्य रथं प्रति । अर्जुनके रथके समीप ‘मार डालो, ले आओ, पकड़ लो, बींध डालो, टुकड़े-टुकड़े कर दो’ इस प्रकार भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। १८ १/२ ।। तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ।। १९ ।। अभ्यधावन् परीप्सन्तः फाल्गुनं भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस भयानक शब्दको सुनकर पाण्डव महारथी अर्जुनकी रक्षाके लिये दौड़े ।। १९ १/२ ।। सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। २० ।। विराटद्रुपदौ चोभौ राक्षसश्च घटोत्कचः । अभिमन्युश्च संक्रुद्धः सप्तैते क्रोधमूर्च्छिताः ।। २१ ।। समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः । सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, राक्षस घटोत्कच और अभिमन्यु—ये सात वीर क्रोधसे मूर्च्छित हो तुरंत ही विचित्र धनुष धारण किये वहाँ दौड़े आये ।। २०-२१ १/२ ।। तेषां समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २२ ।। संग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव । भरतभूषण! उनका वह भयंकर युद्ध देवासुरसंग्रामके समान रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ १/२ ।।