महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2301, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअचिन्तयद् रणे वीरो बुद्ध्या परपुरंजयः । अपनी उस शक्तिको छिन्न-भिन्न हुई देख भीष्मजी क्रोधमें निमग्न हो गये और शत्रुनगरविजयी उन वीर-शिरोमणिने रणक्षेत्रमें अपनी बुद्धिके द्वारा इस प्रकार विचार किया—॥ ३११/२ ॥
शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् ॥ ३२ ॥ यद्येषां न भवेद् गोप्ता विष्वक्सेनो महाबलः । 'यदि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण उन पाण्डवोंकी रक्षा न करते तो मैं इन सबको केवल एक धनुषके ही द्वारा मार सकता था ॥ ३२१/२ ॥
(अजय्यश्चैव लोकानां सर्वेषामिति मे मतिः ।) कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामि पाण्डवान् ॥ ३३ ॥ अवध्यत्वाच्च पाण्डूनां स्त्रीभावाच्च शिखण्डिनः । 'भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके लिये अजेय हैं; ऐसा मेरा विश्वास है। इस समय मैं दो कारणोंका आश्रय लेकर पाण्डवोंसे युद्ध नहीं करूँगा। एक तो ये पाण्डुकी संतान होनेके कारण मेरे लिये अवध्य हैं और दूसरे मेरे सामने शिखण्डी आ गया है, जो पहले स्त्री था ॥ ३३१/२ ॥
पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहम् ॥ ३४ ॥ स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा । तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ॥ ३५ ॥ 'पूर्वकालमें जब मैंने माता सत्यवतीका विवाह पिताजीके साथ कराया था, उस समय मेरे पिताने संतुष्ट होकर मुझे दो वर दिये थे—'जब तुम्हारी इच्छा होगी, तभी तुम मरोगे तथा युद्धमें कोई भी तुम्हें मार न सकेगा।' ऐसी दशामें मुझे स्वेच्छासे ही मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिये। मैं समझता हूँ कि अब उसका अवसर आ गया है' ॥ ३४-३५ ॥
एवं ज्ञात्वा व्यवसितं भीष्मस्यामिततेजसः । ऋषयो वसवश्चैव वियत्स्था भीष्ममब्रुवन् ॥ ३६ ॥ अमिततेजस्वी भीष्मके इस निश्चयको जानकर आकाशमें खड़े हुए ऋषियों और वसुओंने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३६ ॥
यत् ते व्यवसितं तात तदस्माकमपि प्रियम् । तत् कुरुष्व महाराज युद्धे बुद्धिं निवर्तय ॥ ३७ ॥ 'तात! तुमने जो निश्चय किया है, वह हमलोगोंको भी बहुत प्रिय है। महाराज! अब तुम वही करो। युद्धकी ओरसे अपनी चित्तवृत्ति हटा लो' ॥ ३७ ॥
अस्य वाक्यस्य निधने प्रादुरासीच्छिवोऽनिलः । अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥ ३८ ॥