भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2302, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2302

यह बात समाप्त होते ही जलकी बूँदोंके साथ सुखद, शीतल, सुगन्धित एवं मनके अनुकूल वायु चलने लगी ॥ ३८ ॥ देवदुन्दुभयश्चैव सम्प्रणेदुर्महास्वनाः । पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि मारिष ॥ ३९ ॥ आर्य! देवताओंकी दुन्दुभियाँ जोर-जोरसे बज उठीं। भीष्मके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३९ ॥ न च तच्छुश्रुवे कश्चित् तेषां संवदतां नृप । ऋते भीष्मं महाबाहुं मां चापि मुनितेजसा ॥ ४० ॥ राजन्! उस समय उपर्युक्त बातें कहनेवाले ऋषियोंका शब्द महाबाहु भीष्म तथा मुझको छोड़कर और कोई नहीं सुन सका। मुझे तो महर्षि व्यासके प्रभावसे ही वह बात सुनायी पड़ी ॥ ४० ॥ सम्भ्रमश्च महानासीत् त्रिदशानां विशाम्पते । पतिष्यति रथाद् भीष्मे सर्वलोकप्रिये तदा ॥ ४१ ॥ प्रजानाथ! सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय भीष्म रथसे गिरना चाहते हैं, यह जानकर उस समय सम्पूर्ण देवताओंको भी महान् आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥ इति देवगणानां च वाक्यं श्रुत्वा महातपाः । ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ४२ ॥ भिद्यमानः शितैर्बाणैः सर्वावरणभेदिभिः । देवताओंकी वह बात सुनकर महातपस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा विदीर्ण होनेपर भी अर्जुनको जीतनेका प्रयत्न न कर सके ॥ ४२ १/२ ॥ शिखण्डी तु महाराज भरतानां पितामहम् ॥ ४३ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो नवभिर्निशितैः शरैः । महाराज! उस समय शिखण्डीने कुपित होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीकी छातीमें नौ पैने बाण मारे ॥ ४३ १/२ ॥ स तेनाभिहतः संख्ये भीष्मः कुरुपितामहः ॥ ४४ ॥ नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाचलः । नरेश्वर! युद्धमें शिखण्डीके द्वारा आहत होकर भी कुरुवंशियोंके पितामह भीष्म उसी प्रकार कम्पित नहीं हुए, जैसे भूकम्प होनेपर भी पर्वत नहीं हिलता ॥ ४४ १/२ ॥ ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ॥ ४५ ॥ गाङ्गेयं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् । तदनन्तर अर्जुनने हँसकर गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए गंगानन्दन भीष्मको पचीस बाण मारे ॥ ४५ १/२ ॥