महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2303, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनः पुनः शतैरेनं त्वरमाणो धनंजयः ।। ४६ ।।
सर्वगात्रेषु संक्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ।
तत्पश्चात् पुनः उन्होंने अत्यन्त कुपित हो शीघ्रतापूर्वक सौ बाणोंद्वारा भीष्मके सम्पूर्ण अंगों और सभी मर्मस्थानोंमें आघात किया ।। ४६ १/२ ।।
एवमन्यैरपि भृशं विद्धयमानः सहस्रशः ।। ४७ ।।
तानप्याशु शरैर्भीष्मः प्रविव्याध महारथः ।
इसी प्रकार दूसरे लोगोंने भी सहस्रों बाणोंद्वारा भीष्मजीको घायल किया। तब महारथी भीष्मने भी तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा उन सबको बींध डाला ।। ४७ १/२ ।।
तैश्च मुक्ताञ्छरान् भीष्मो युधि सत्यपराक्रमः ।। ४८ ।।
निवारयामास शरैः समं संनतपर्वभिः ।
सत्यपराक्रमी भीष्म युद्धस्थलमें अन्य सब राजाओं-द्वारा छोड़े हुए बाणोंका झुकी हुई गाँठवाले अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही निवारण कर देते थे ।। ४८ १/२ ।।
शिखण्डी तु रणे बाणान् यान् मुमोच महारथः ।। ४९ ।।
न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।
महारथी शिखण्डीने रणक्षेत्रमें जिनका प्रयोग किया था, वे शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखयुक्त बाण भीष्मजीके शरीरमें कोई घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ।। ४९ १/२ ।।
ततः किरीटी संक्रुद्धो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ।। ५० ।।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् ।
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए अर्जुन शिखण्डीको आगे रखकर पुनः भीष्मकी ही ओर बढ़े। उन्होंने भीष्मजीके धनुषको काट दिया ।। ५० १/२ ।।
अथैनं नवभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ।। ५१ ।।
सारथिं विशिखैश्चास्य दशभिः समकम्पयत् ।
तदनन्तर नौ बाणोंसे उन्हें घायल करके एक बाणसे उनके ध्वजको भी काट डाला। फिर दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको कम्पित कर दिया ।। ५१ १/२ ।।
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो बलवत्तरम् ।। ५२ ।।
तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरघातयत् ।
तब गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त प्रबल धनुष हाथमें लिया; परंतु अर्जुनने तीन तीखे भल्लोंद्वारा मारकर उसे भी तीन जगहसे खण्डित कर दिया ।। ५२ १/२ ।।
निमेषार्धेन कौन्तेय आत्तमात्तं महारणे ।। ५३ ।।
एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुबहून्यथ ।