भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2304

उस महायुद्धमें भीष्म जो-जो धनुष हाथमें लेते थे कुन्तीकुमार अर्जुन उसे आधे निमेषमें काट डालते थे। इस प्रकार उन्होंने रणक्षेत्रमें उनके बहुत-से धनुष खण्डित कर दिये॥ ५३ १/२ ॥

ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ५४ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ।
तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनपर हाथ उठाना बंद कर दिया। फिर भी अर्जुनने उन्हें पचीस बाण मारे॥ ५४ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासो दुःशासनमभाषत ॥ ५५ ॥
एष पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः ।
शरैरनेकसाहस्रैर्मर्मेवाभ्यहनद् रणे ॥ ५६ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भीष्मने दुःशासनसे कहा—'ये पाण्डव महारथी अर्जुन युद्धमें क्रुद्ध होकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा मुझे घायल कर चुके हैं॥ ५५-५६॥

न चैष समरे शक्यो जेतुं वज्रभृता अपि ।
न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः ॥ ५७ ॥
मां चापि शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्या महारथाः ।
‘इन्हें वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें जीत नहीं सकते। इसी प्रकार समस्त देवता, दानव तथा राक्षस वीर एक साथ आ जायँ तो मुझे भी वे युद्धमें परास्त नहीं कर सकते; फिर दूसरे मानव महारथियोंकी तो बात ही क्या है?'॥ ५७ १/२ ॥

एवं तयोः संवदतोः फाल्गुनो निशितैः शरैः ॥ ५८ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य भीष्मं विव्याध संयुगे ।
इस प्रकार दुःशासन और भीष्ममें जब बातचीत हो रही थी, उसी समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ५८ १/२ ॥

ततो दुःशासनं भूयः स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ५९ ॥
अतिविद्धः शितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना ।
वज्राशनिसमस्पर्शा अर्जुनेन शरा युधि ॥ ६० ॥
मुक्ताः सर्वेऽव्यवच्छिन्ना नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
तब वे पुनः दुःशासनसे मुसकराते हुए-से बोले—'गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें ऐसे बाण छोड़े हैं, जिनका स्पर्श वज्र और विद्युत्‌के समान असह्य है। उनके तीखे बाणोंसे मैं अत्यन्त घायल हो गया हूँ। ये अविच्छिन्न रूपसे छूटनेवाले समस्त बाण शिखण्डीके नहीं हो सकते; ॥ ५९-६० १/२ ॥

निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः ॥ ६१ ॥