भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2308, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2308

तदनन्तर एकमात्र भीष्मको पाण्डव-पक्षीय बहुत-से योद्धाओंने चारों ओरसे घेर लिया और समस्त कौरवोंको सब ओर खदेड़कर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८४ ॥

निपातयत गृह्णीत युध्यध्वमवकृन्तत ।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दो राजन् भीष्मरथं प्रति ॥ ८५ ॥
राजन्! उस समय भीष्मके रथके समीप ‘मार गिराओ, पकड़ लो, युद्ध करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ इत्यादि भयंकर शब्द गूँज रहे थे ॥ ८५ ॥

निहत्य समरे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् ॥ ८६ ॥
महाराज! समरमें भीष्म सैकड़ों और हजारों वीरोंका वध करके स्वयं इस स्थितिमें पहुँच गये थे कि उनके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया था, जो बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ८६ ॥

एवंभूतस्तव पिता शरैर्विशकलीकृतः ।
शिताग्रैः फाल्गुनेनाजौ प्राक्शिराः प्रापतद् रथात् ॥ ८७ ॥
किंचिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् ।
इस प्रकार आपके ताऊ भीष्म युद्धस्थलमें अर्जुनके तीखे बाणोंसे अत्यन्त विद्ध हो गये थे—उनका शरीर छिदकर छलनी हो रहा था। वे उसी अवस्थामें, जब कि दिन थोड़ा ही शेष था, आपके पुत्रोंके देखते-देखते पूर्व दिशाकी ओर मस्तक किये रथसे नीचे गिर पड़े ॥ ८७ ½ ॥

हाहेति दिवि देवानां पार्थिवानां च भारत ॥ ८८ ॥
पतमाने रथाद् भीष्मे बभूव सुमहान्स्वनः ।
भारत! रथसे भीष्मके गिरते समय आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा भूतलवर्ती राजाओंमें बड़े जोरसे हाहाकार मच गया ॥ ८८ ½ ॥

सम्पतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥ ८९ ॥
सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापतन् हृदयानि नः ।
महाराज! महात्मा पितामह भीष्मको रथसे नीचे गिरते देखकर हम सब लोगोंके हृदय भी उनके साथ ही गिर पड़े ॥ ८९ ½ ॥

स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् ॥ ९० ॥
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
धरणीं न स पस्पर्श शरसंघैः समावृतः ॥ ९१ ॥
वे महाबाहु भीष्म सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे। वे कटी हुई इन्द्रकी ध्वजाके समान पृथ्वीको शब्दायमान करते हुए गिर पड़े। उनके सारे अंगोंमें सब ओर बाण बिंधे हुए थे। इसलिये गिरनेपर भी उनका धरतीसे स्पर्श नहीं हुआ ॥ ९०-९१ ॥

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