महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2309, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरत्तल्पे महेष्वासं शयानं पुरुषर्षभम् । रथात् प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ॥ ९२ ॥ रथसे गिरकर बाणशय्यापर सोये हुए पुरुषप्रवर महाधनुर्धर भीष्मके भीतर दिव्यभावका आवेश हुआ ॥ ९२ ॥
अभ्यवर्षच्च पर्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी । पतन् स ददृशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥ ९३ ॥ आकाशसे मेघ वर्षा करने लगा, धरती काँपने लगी, गिरते-गिरते उन्होंने देखा, अभी सूर्य दक्षिणायनमें हैं (यह मृत्युके लिये उत्तम समय नहीं है) ॥ ९३ ॥
संज्ञां चोपालभद् वीरः कालं संचिन्त्य भारत । अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्या वाचः समन्ततः ॥ ९४ ॥ भारत! समयका विचार करके वीरवर भीष्मने अपने होश-हवाशको ठीक रखा। उस समय आकाशमें सब ओरसे दिव्य वाणी सुनायी दी ॥ ९४ ॥
कथं महात्मा गाङ्गेयः सर्वशस्त्रभृतां वरः । कालकर्ता नरव्याघ्रः सम्प्राप्ते दक्षिणायने ॥ ९५ ॥ महात्मा गंगानन्दन भीष्म सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा कालपर भी प्रभुत्व रखनेवाले थे। इन्होंने दक्षिणायनमें मृत्यु क्यों स्वीकार की? ॥ ९५ ॥
स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेयस्तच्छ्रुत्वा वाक्यमब्रवीत् । धारयामास च प्राणान् पतितोऽपि महीतले ॥ ९६ ॥ उत्तरायणमन्विच्छन् भीष्मः कुरुपितामहः । तस्य तन्मतमाज्ञाय गंगा हिमवतः सुता ॥ ९७ ॥ महर्षीन् हंसरूपेण प्रेषयामास तत्र वै । उनकी वह बात सुनकर गंगानन्दन भीष्मने कहा—'मैं अभी जीवित हूँ।' कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्म पृथ्वीपर गिरकर भी उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राणोंको रोके हुए हैं। उनके इस अभिप्रायको जानकर हिमालयनन्दिनी गंगादेवीने महर्षियोंको हंसरूपसे वहाँ भेजा ॥ ९६-९७ १/२ ॥
ततः सम्पातिनो हंसास्त्वरिता मानसौकसः ॥ ९८ ॥ आजग्मुः सहिता द्रष्टुं भीष्मं कुरुपितामहम् । यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ॥ ९९ ॥ वे मानसरोवरमें निवास करनेवाले हंसरूपधारी महर्षि एक साथ उड़ते हुए बड़ी उतावलीके साथ कुरुकुलके वृद्धपितामह भीष्मका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ वे नरश्रेष्ठ बाणशय्यापर सो रहे थे ॥
ते तु भीष्मं समासाद्य ऋषयो हंसरूपिणः ।