भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2311

उनका वह वरदान सफल हो। मैं प्राणत्यागका नियत समय आनेतक अवश्य इन प्राणोंको रोक रखूँगा' ।। १०७-१०८ ।।

इत्युक्त्वा तांस्तदा हंसान् स शेते शरतल्पगः ।
एवं कुरूणां पतिते शृङ्गे भीष्मे महौजसि ।। १०९ ।।
पाण्डवाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ।
उस समय उन हंसोंसे ऐसा कहकर वे बाण-शय्यापर पूर्ववत् सोये रहे। इस प्रकार कुरुकुलशिरोमणि महापराक्रमी भीष्मके गिर जानेपर पाण्डव और सृंजय हर्षसे सिंहनाद करने लगे ।। १०९ १/३ ।।

तस्मिन् हते महासत्त्वे भरतानां पितामहे ।। ११० ।।
न किंचित् प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्ते भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! उन महान् शक्तिशाली एवं भरत-वंशियोंके पितामह भीष्मके मारे जानेपर आपके पुत्रोंको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ।। ११० १/३ ।।

सम्मोहश्चैव तुमुलः कुरूणामभवत् तदा ।। १११ ।।
कृपदुर्योधनमुखा निःश्वस्य रुरुदुस्ततः ।
उस समय कौरवोंपर बड़ा भयंकर मोह छा गया। कृपाचार्य और दुर्योधन आदि सब लोग सिसक-सिसककर रोने लगे ।। १११ १/३ ।।

विषादाच्च चिरं कालमतिष्ठन् विगतेन्द्रियाः ।। ११२ ।।
दध्युश्चैव महाराज न युद्धे दधिरे मनः ।
ऊरुग्राहगृहीताश्च नाभ्यधावन्त पाण्डवान् ।। ११३ ।।
वे सब लोग विषादके कारण दीर्घकालतक ऐसी अवस्थामें पड़े रहे, मानो उनकी सारी इन्द्रियाँ नष्ट हो गयी हों। महाराज! वे भारी चिन्तामें डूब गये। युद्धमें उनका मन नहीं लगता था। वे पाण्डवोंपर धावा न कर सके, मानो किसी महान् ग्राहने उन्हें पकड़ लिया हो ।। ११२-११३ ।।

अवध्ये शन्तनोः पुत्रे हते भीष्मे महौजसि ।
अभावः सहसा राजन् कुरुराजस्य तर्कितः ।। ११४ ।।
राजन्! महातेजस्वी शान्तनुपुत्र भीष्म अवध्य थे, तो भी मारे गये। इससे सहसा सब लोगोंने यही अनुमान किया कि कुरुराज दुर्योधनका विनाश भी अवश्यम्भावी है ।। ११४ ।।

हतप्रवीरास्तु वयं निकृत्ताश्च शितैः शरैः ।
कर्तव्यं नाभिजानीमो निर्जिताः सव्यसाचिना ।। ११५ ।।
सव्यसाची अर्जुनने हम सब लोगोंपर विजय पायी। उनके तीखे बाणोंसे हमलोग क्षत-विक्षत हो रहे थे और हमारे प्रमुख वीर उनके हाथों मारे गये थे। उस अवस्थामें हमें अपना कर्तव्य नहीं सूझता था ।। ११५ ।।

पाण्डवाश्च जयं लब्ध्वा परत्र च परां गतिम् ।

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