महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2312, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वे दध्मुर्महाशङ्खान् शूराः परिघबाहवः ॥ ११६ ॥ परिघके समान मोटी भुजाओंवाले शूरवीर पाण्डवोंने इहलोकमें विजय पाकर परलोकमें भी उत्तम गति निश्चित कर ली। वे सब-के-सब बड़े-बड़े शंख बजाने लगे ॥
सोमकाश्च सपञ्चालाः प्राहृष्यन्त जनेश्वर । ततस्तूर्यसहस्रेषु नदत्सु स महाबलः ॥ ११७ ॥ आस्फोटयामास भृशं भीमसेनो ननाद च । जनेश्वर! पांचालों और सोमकोंके तो हर्षकी सीमा न रही। सहस्रों रणवाद्य बजने लगे। उस समय महाबली भीमसेन जोर-जोरसे ताल ठोकने और सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ११७ ½ ॥
सेनयोरुभयोश्चापि गाङ्गेये निहते विभौ ॥ ११८ ॥ संन्यस्य वीराः शस्त्राणि प्राध्यायन्त समन्ततः । शक्तिशाली गंगानन्दन भीष्मके मारे जानेपर सब ओर दोनों सेनाओंके सब वीर अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥ ११८ ½ ॥
प्राक्रोशन् प्राद्रवंश्चान्ये जग्मुर्मोहं तथापरे ॥ ११९ ॥ कुछ फूट-फूटकर रोने-चिल्लाने लगे, कुछ इधर-उधर भागने लगे और कुछ वीर मोहको प्राप्त (मूर्च्छित) हो गये ॥ ११९ ॥
क्षात्रं चान्येऽभ्यनिन्दन्त भीष्मं चान्येऽभ्यपूजयन् । ऋषयः पितरश्चैव प्रशशंसुर्महाव्रतम् ॥ १२० ॥ कुछ लोग क्षात्रधर्मकी निन्दा कर रहे थे और कुछ भीष्मजीकी प्रशंसा कर रहे थे। ऋषियों और पितरोंने महान् व्रतधारी भीष्मकी बड़ी प्रशंसा की ॥ १२० ॥
भरतानां च ये पूर्वे ते चैनं प्रशंसिरे । महोपनिषदं चैव योगमास्थाय वीर्यवान् ॥ १२१ ॥ जपञ्शान्तनवो धीमान् कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत् ॥ १२२ ॥ भरतवंशके पूर्वजोंने भी भीष्मजीकी बड़ी बड़ाई की। परम पराक्रमी एवं बुद्धिमान् शान्तनुनन्दन भीष्म महान् उपनिषदोंके सारभूत योगका आश्रय ले प्रणवका जप करते हुए उत्तरायणकालकी प्रतीक्षामें बाणशय्यापर सोये रहे ॥ १२१-१२२ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मनिपातने एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मजीके रथसे गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १२५ श्लोक हैं।]