भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2320

उपासिष्ये विवस्वन्तमेवं शरशताचितः ॥ ५४ ॥
‘राजाओ! मेरे इस स्थानके चारों ओर खाई खोद दो। मैं यहीं इसी प्रकार सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त शरीरके द्वारा भगवान् सूर्यकी उपासना करूँगा ॥ ५४ ॥
उपारमध्वं संग्रामाद् वैरमुत्सृज्य पार्थिवाः ।
‘भूपालगण! अब आपलोग आपसका वैरभाव छोड़कर युद्धसे विरत हो जायँ’ ॥ ५४ १/२ ॥

संजय उवाच

उपातिष्ठन्नथो वैद्याः शल्योद्धरणकोविदाः ॥ ५५ ॥
सर्वोपकरणैर्युक्ताः कुशलैः साधु शिक्षिताः ।
**संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर शरीरसे बाणको निकाल फेंकनेकी कलामें कुशल वैद्य भीष्मजीकी सेवामें उपस्थित हुए। वे समस्त आवश्यक उपकरणोंसे युक्त और कुशल पुरुषोंद्वारा भलीभाँति शिक्षा पाये हुए थे ॥ ५५ १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा जाह्नवीपुत्रः प्रोवाच तनयं तव ॥ ५६ ॥
धनं दत्त्वा विसृज्यन्तां पूजयित्वा चिकित्सकाः ।
एवंगते मयेदानीं वैद्यैः कार्यमिहास्ति किम् ॥ ५७ ॥
उन्हें देखकर गंगानन्दन भीष्मने आपके पुत्र दुर्योधनसे कहा—‘वत्स! इन चिकित्सकोंको धन देकर सम्मानपूर्वक विदा कर दो। मुझे यहाँ इस अवस्थामें अब इन वैद्योंसे क्या काम है? ॥ ५६-५७ ॥
क्षत्रधर्मे प्रशस्तां हि प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ।
नैष धर्मो महीपालाः शरतल्पगतस्य मे ॥ ५८ ॥
एभिरेव शरैश्चाहं दग्धव्योऽस्मि नराधिपाः ।
‘क्षत्रियधर्ममें जिसकी प्रशंसा की गयी है, उस उत्तम गतिको मैं प्राप्त हुआ हूँ। भूपालो! मैं बाणशय्यापर सोया हुआ हूँ। अब मेरा यह धर्म नहीं है कि इन बाणोंको निकालकर चिकित्सा कराऊँ। नरेश्वरो! मेरे इस शरीरको इन बाणोंके साथ ही दग्ध कर देना चाहिये’ ॥ ५८ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ५९ ॥
वैद्यान् विसर्जयामास पूजयित्वा यथार्हतः ।
भीष्मकी यह बात सुनकर आपके पुत्र दुर्योधनने यथायोग्य सम्मान करके वैद्योंको विदा किया ॥ ५९ १/२ ॥
ततस्ते विस्मयं जग्मुर्नानाजनपदेश्वराः ॥ ६० ॥
स्थितिं धर्मे परां दृष्ट्वा भीष्मस्यामिततेजसः ।