महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2321, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी नरेशगण अमिततेजस्वी भीष्मकी यह धर्मविषयक उत्तम निष्ठा देखकर बड़े विस्मित हुए ।। ६० १/२ ।। उपधानं ततो दत्त्वा पितुस्ते मनुजेश्वराः ।। ६१ ।। सहिताः पाण्डवाः सर्वे कुरवश्च महारथाः । उपगम्य महात्मानं शयानं शयने शुभे ।। ६२ ।। तेऽभिवाद्य ततो भीष्मं कृत्वा च त्रिः प्रदक्षिणम् । विधाय रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्ततः ।। ६३ ।। वीराः स्वशिबिराण्येव ध्यायन्तः परमातुराः । निवेशायाभ्युपागच्छन् सायाह्ने रुधिरोक्षिताः ।। ६४ ।।
राजन्! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये। वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे। सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये ।। ६१—६४ ।।
निविष्टान् पाण्डवांश्चैव प्रीयमाणान् महारथान् । भीष्मस्य पतने हृष्टानुपगम्य महाबलः ।। ६५ ।। उवाच माधवः काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । दिष्ट्या जयसि कौरव्य दिष्ट्या भीष्मो निपातितः ।। ६६ ।।
पाण्डव महारथी भीष्मके गिर जानेसे बहुत प्रसन्न थे और हर्षमें भरकर विश्राम कर रहे थे। उस समय महाबली भगवान् श्रीकृष्ण यथासमय उनके पास पहुँचकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले—‘कुरुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीत रहे हो। यह भी भाग्यकी ही बात है कि भीष्म रथसे गिरा दिये गये ।। ६५-६६ ।।
अवध्यो मानुषैरेव सत्यसंधो महारथः । अथवा दैवतैः सार्धं सर्वशास्त्रस्य पारगः ।। ६७ ।। त्वां तु चक्षुर्हणं प्राप्य दग्धो घोरेण चक्षुषा ।
‘ये सत्यप्रतिज्ञ महारथी भीष्म सम्पूर्ण शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे। इन्हें मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता मिलकर भी मार नहीं सकते थे। आप दृष्टिपातमात्रसे ही दूसरोंको भस्म करनेमें समर्थ हैं। आपके पास पहुँचकर भीष्म आपकी घोर दृष्टिसे ही नष्ट हो गये हैं’ ।। ६७ १/२ ।।
एवमुक्तो धर्मराजः प्रत्युवाच जनार्दनम् ।। ६८ ।। तव प्रसादाद् विजयः क्रोधात् तव पराजयः । त्वं हि नः शरणं कृष्ण भक्तानामभयंकरः ।। ६९ ।।