भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2324, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2324

कौरव तथा पाण्डव युद्धसे निवृत्त हो कवच खोलकर अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर पहलेकी भाँति परस्पर प्रेमभाव रखते हुए अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथोचित क्रमसे शत्रुदमन दुर्जय वीर देवव्रत भीष्मके समीप एक साथ बैठ गये ।। ६-७ ।।

सा पार्थिवशताकीर्णा समितिर्भीष्मशोभिता ।
शुशुभे भारती दीप्ता दीवीवादित्यमण्डलम् ॥ ८ ॥
सैकड़ों राजाओंसे भरी और भीष्मसे सुशोभित हुई वह भरतवंशियोंकी दीप्तिशालिनी सभा आकाशमें सूर्यमण्डलकी भाँति उस रणभूमिमें शोभा पाने लगी ।। ८ ।।

विबभौ च नृपाणां सा गंगासुतमुपासताम् ।
देवानांमिव देवेशं पितामहमुपासताम् ॥ ९ ॥
गंगानन्दन भीष्मके पास बैठी हुई राजाओंकी वह मण्डली देवेश्वर ब्रह्माजीकी उपासना करनेवाले देवताओंके समान सुशोभित हो रही थी ।। ९ ।।

भीष्मस्तु वेदनां धैर्यान्निगृह्य भरतर्षभ ।
अभितप्तः शरैश्चैव निःश्वसन्नुरगो यथा ॥ १० ॥
शराभितप्तकायोऽपि शस्त्रसम्पातमूर्च्छितः ।
पानीयमिति सम्प्रेक्ष्य राजंस्तान् प्रत्यभाषत ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! भीष्मजी बाणोंसे संतप्त होकर सर्पके समान लम्बी साँस खींच रहे थे। वे अपनी वेदनाको धैर्यपूर्वक सह रहे थे। बाणोंकी जलनसे उनका सारा शरीर जल रहा था। वे शस्त्रोंके आघातसे मूर्च्छित-से हो रहे थे। उस समय उन्होंने राजाओंकी ओर देखकर केवल इतना ही कहा 'पानी' ।। १०-११ ।।

ततस्ते क्षत्रिया राजन्नुपाजहुः समन्ततः ।
भक्ष्यानुच्चावचान् राजन् वारिकुम्भांश्च शीतलान् ॥ १२ ॥
राजन्! तब वे क्षत्रियनरेश चारों ओरसे भोजनकी उत्तमोत्तम सामग्री और शीतल जलसे भरे हुए घड़े ले आये ।। १२ ।।

उपानीतं तु पानीयं दृष्ट्वा शान्तनवोऽब्रवीत् ।
नाद्यातीता मया शक्या भोगाः केचन मानुषाः ॥ १३ ॥
अपक्रान्तो मनुष्येभ्यः शरशय्यां गतो ह्यहम् ।
प्रतीक्षमाणस्तिष्ठामि निवृत्तिं शशिसूर्ययोः ॥ १४ ॥
उनके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने कहा—'अब मैं मनुष्यलोकके कोई भी भोग अपने उपयोगमें नहीं ला सकता, मैं उन्हें छोड़ चुका हूँ। यद्यपि यहाँ बाणशय्यापर सो रहा हूँ, तथापि मनुष्यलोकसे ऊपर उठ चुका हूँ। केवल सूर्य-चन्द्रमाके उत्तरपथपर आनेकी प्रतीक्षांमें यहाँ रुका हुआ हूँ' ।। १३-१४ ।।

एवमुक्त्वा शान्तनवो निन्दन् वाक्येन पार्थिवान् ।
अर्जुनं द्रष्टुमिच्छामीत्यभ्यभाषत भारत ॥ १५ ॥

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