भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2325, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2325

भारत! ऐसा कहकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी वाणीद्वारा अन्य राजाओंकी निन्दा करते हुए कहा—'अब मैं अर्जुनको देखना चाहता हूँ' ।। १५ ।। अथोपेत्य महाबाहुरभिवाद्य पितामहम् । अतिष्ठत् प्राञ्जलिः प्रह्वः किं करोमीति चाब्रवीत् ।। १६ ।। तब महाबाहु अर्जुन पितामह भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़े खड़े हो गये और विनयपूर्वक बोले—'मेरे लिये क्या आज्ञा है, मैं कौन-सी सेवा करूँ?' ।। १६ ।। तं दृष्ट्वा पाण्डवं राजन्नभिवाद्याग्रतः स्थितम् । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः प्रीतो धनंजयम् ।। १७ ।। राजन्! प्रणाम करके आगे खड़े हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखकर धर्मात्मा भीष्म बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले— ।। १७ ।। दह्यतीव शरीरं मे संवृतस्य तवेषुभिः । मर्माणि परिदूयन्ते मुखं च परिशुष्यति ।। १८ ।। 'अर्जुन! तुम्हारे बाणोंसे मेरे सम्पूर्ण अंग बिंधे हुए हैं; अतः मेरा यह शरीर दग्ध-सा हो रहा है। सारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है। मुँह सूखता जा रहा है ।। १८ ।। वेदनार्तशरीरस्य प्रयच्छापो ममार्जुन् । त्वं हि शक्तो महेष्वास दातुमापो यथाविधि ।। १९ ।। 'महाधनुर्धर अर्जुन! वेदनासे पीड़ित शरीरवाले मुझ वृद्धको तुम पानी लाकर दो। तुम्हीं विधिपूर्वक मेरे लिये दिव्य जल प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो' ।। १९ ।। अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य वीर्यवान् । अधिज्यं बलवत् कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः ।। २० ।। तब 'बहुत अच्छा' कहकर पराक्रमी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो गये और गाण्डीव धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे खींचने लगे ।। २० ।। तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । वित्रसुः सर्वभूतानि सर्वे श्रुत्वा च पार्थिवाः ।। २१ ।। उनके धनुषकी टंकारध्वनि वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी। उसे सुनकर सभी प्राणी और समस्त भूपाल डर गये ।। २१ ।। ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वरः । शयानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।। २२ ।। संधाय च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य स पाण्डवः पर्जन्यास्त्रेण संयोज्य सर्वलोकस्य पश्यतः ।। २३ ।। अविध्यत् पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे ।