महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविस्मयं परमं जग्मुस्ततस्ते वसुधाधिपाः । इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनके उस अद्भुत कर्मसे वहाँ बैठे हुए समस्त भूपाल बड़े विस्मयको प्राप्त हुए ॥ २६ १/२ ॥ तत् कर्म प्रेक्ष्य बीभत्सोरतिमानुषविक्रमम् ॥ २७ ॥ सम्प्रावेपन्त कुरवो गावः शीतार्दिता इव । अर्जुनका वह अलौकिक कर्म देखकर समस्त कौरव सर्दीकी सतायी हुई गौओंके समान थर-थर काँपने लगे ॥ २७ १/२ ॥ विस्मयाच्चोत्तरीयाणि व्याविध्यन् सर्वतो नृपाः ॥ २८ ॥ शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् । वहाँ बैठे हुए नरेशगण आश्चर्यसे चकित हो सब ओर अपने दुपट्टे हिलाने लगे। चारों ओर शंख और नगाड़ोंकी गम्भीर ध्वनि गूँज उठी ॥ २८ १/२ ॥ तृप्तः शान्तनवश्चापि राजन् बीभत्सुमब्रवीत् ॥ २९ ॥ सर्वपार्थिववीराणां संनिधौ पूजयन्निव । राजन्! उस जलसे तृप्त होकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनसे समस्त वीरनरेशोंके समीप उनकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २९ १/२ ॥ नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन ॥ ३० ॥ कथितो नारदेनासि पूर्वर्षिरमितद्युते । वासुदेवसहायस्त्वं महत् कर्म करिष्यसि ॥ ३१ ॥ यन्नोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरपि ध्रुवम् । ‘महाबाहु कौरवनन्दन! तुममें ऐसे पराक्रमका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। अमिततेजस्वी वीर! मुझे नारदजीने पहले ही बता दिया था कि तुम पुरातन महर्षि नर हो और नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे इस भूतलपर ऐसे-ऐसे महान् कर्म करोगे, जिन्हें निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओंके साथ देवराज इन्द्र भी नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ १/२ ॥ विदुस्त्वां निधनं पार्थ सर्वक्षत्रस्य तद्विदः ॥ ३२ ॥ धनुर्धराणामेकस्त्वं पृथिव्यां प्रवरो नृषु ॥ ३३ ॥ ‘पार्थ! जानकार लोग तुम्हें सम्पूर्ण क्षत्रियोंकी मृत्युरूप जानते हैं। तुम भूतलपर मनुष्योंमें श्रेष्ठ और धनुर्धरोंमें प्रधान हो ॥ ३२-३३ ॥ मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां पतगेश्वरः । सरितां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥ ३४ ॥ ‘जंगम प्राणियोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं, पक्षियोंमें पक्षिराज गरुड़ श्रेष्ठ माने जाते हैं, सरिताओंमें समुद्र श्रेष्ठ हैं और चौपायोंमें गौ उत्तम मानी गयी है ॥ ३४ ॥ आदित्यस्तेजसां श्रेष्ठो गिरीणां हिमवान् वरः ।