महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विस्मयं परमं जग्मुस्ततस्ते वसुधाधिपाः । इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनके उस अद्भुत कर्मसे वहाँ बैठे हुए समस्त भूपाल बड़े विस्मयको प्राप्त हुए ॥ २६ १/२ ॥ तत् कर्म प्रेक्ष्य बीभत्सोरतिमानुषविक्रमम् ॥ २७ ॥ सम्प्रावेपन्त कुरवो गावः शीतार्दिता इव । अर्जुनका वह अलौकिक कर्म देखकर समस्त कौरव सर्दीकी सतायी हुई गौओंके समान थर-थर काँपने लगे ॥ २७ १/२ ॥ विस्मयाच्चोत्तरीयाणि व्याविध्यन् सर्वतो नृपाः ॥ २८ ॥ शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् । वहाँ बैठे हुए नरेशगण आश्चर्यसे चकित हो सब ओर अपने दुपट्टे हिलाने लगे। चारों ओर शंख और नगाड़ोंकी गम्भीर ध्वनि गूँज उठी ॥ २८ १/२ ॥ तृप्तः शान्तनवश्चापि राजन् बीभत्सुमब्रवीत् ॥ २९ ॥ सर्वपार्थिववीराणां संनिधौ पूजयन्निव । राजन्! उस जलसे तृप्त होकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनसे समस्त वीरनरेशोंके समीप उनकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २९ १/२ ॥ नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन ॥ ३० ॥ कथितो नारदेनासि पूर्वर्षिरमितद्युते । वासुदेवसहायस्त्वं महत् कर्म करिष्यसि ॥ ३१ ॥ यन्नोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरपि ध्रुवम् । ‘महाबाहु कौरवनन्दन! तुममें ऐसे पराक्रमका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। अमिततेजस्वी वीर! मुझे नारदजीने पहले ही बता दिया था कि तुम पुरातन महर्षि नर हो और नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे इस भूतलपर ऐसे-ऐसे महान् कर्म करोगे, जिन्हें निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओंके साथ देवराज इन्द्र भी नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ १/२ ॥ विदुस्त्वां निधनं पार्थ सर्वक्षत्रस्य तद्विदः ॥ ३२ ॥ धनुर्धराणामेकस्त्वं पृथिव्यां प्रवरो नृषु ॥ ३३ ॥ ‘पार्थ! जानकार लोग तुम्हें सम्पूर्ण क्षत्रियोंकी मृत्युरूप जानते हैं। तुम भूतलपर मनुष्योंमें श्रेष्ठ और धनुर्धरोंमें प्रधान हो ॥ ३२-३३ ॥ मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां पतगेश्वरः । सरितां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥ ३४ ॥ ‘जंगम प्राणियोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं, पक्षियोंमें पक्षिराज गरुड़ श्रेष्ठ माने जाते हैं, सरिताओंमें समुद्र श्रेष्ठ हैं और चौपायोंमें गौ उत्तम मानी गयी है ॥ ३४ ॥ आदित्यस्तेजसां श्रेष्ठो गिरीणां हिमवान् वरः ।
जातीनां ब्राह्मणः श्रेष्ठः श्रेष्ठस्त्वमसि धन्विनाम् ॥ ३५ ॥
‘तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं, पर्वतोंमें हिमालय महान् है, जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है और तुम सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हो ॥ ३५ ॥
न वै श्रुतं धार्तराष्ट्रेण वाक्यं
मयोच्यमानं विदुरेण चैव ।
द्रोणेन रामेण जनार्दनेन
मुहुर्मुहुः संजयेनापि चोक्तम् ॥ ३६ ॥
‘मैंने, विदुरने, द्रोणाचार्यने, परशुरामजीने, भगवान् श्रीकृष्णने तथा संजयने भी बारंबार युद्ध न करनेकी सलाह दी है; परंतु दुर्योधनने हमलोगोंकी बातें नहीं सुनीं ॥
परीतबुद्धिर्हि विसंज्ञकल्पो
दुर्योधनो न च तच्छ्रद्दधाति ।
स शेष्यते वै निहतश्चिराय
शास्त्रातिगो भीमबलाभिभूतः ॥ ३७ ॥
‘दुर्योधनकी बुद्धि विपरीत हो गयी है, वह अचेत-सा हो रहा है; इसलिये हमलोगोंकी बातपर विश्वास नहीं करता है। वह शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा है। इसलिये भीमसेनके बलसे पराजित हो मारा जाकर रणभूमिमें दीर्घकालके लिये सो जायगा’ ॥ ३७ ॥
एतच्छ्रुत्वा तद्वचः कौरवेन्द्रो
दुर्योधनो दीनमना बभूव ।
तमब्रवीच्छान्तनवोऽभिवीक्ष्य
निबोध राजन् भव वीतमन्युः ॥ ३८ ॥
भीष्मजीकी यह बात सुनकर कौरवराज दुर्योधन मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। तब शान्तनुनन्दन भीष्मने उसकी ओर देखकर कहा—‘राजन्! मेरी बातपर ध्यान दो और क्रोधशून्य हो जाओ ॥ ३८ ॥
दृष्टं दुर्योधनैतत् ते यथा पार्थेन धीमता ।
जलस्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः ॥ ३९ ॥
‘दुर्योधन! बुद्धिमान् अर्जुनने जिस प्रकार शीतल, अमृतके समान मधुर गन्धयुक्त जलकी धारा प्रकट की है, उसे तुमने प्रत्यक्ष देख लिया है ॥ ३९ ॥
एतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन् नान्यः कश्चन विद्यते ।
आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम् ॥ ४० ॥
ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ।
धातुस्त्वष्टुश्च सवितुर्वैवस्वतमथापि वा ॥ ४१ ॥
सर्वस्मिन् मानुषे लोके वेत्त्येको हि धनंजयः ।
कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वेदेह कश्चन ॥ ४२ ॥ ‘इस संसारमें ऐसा पराक्रम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आग्नेय, वारुण, सौम्य, वायव्य, वैष्णव, ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म, पारमेष्ठ्य, प्राजापत्य, धात्र, त्वाष्ट्र, सावित्र और वैवस्वत आदि सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंको इस समस्त मानव-जगत्में एकमात्र अर्जुन अथवा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण जानते हैं। दूसरा कोई यहाँ इन अस्त्रोंको नहीं जानता है ॥ ४०—४२ ॥
अशक्यः पाण्डवस्तात युद्धे जेतुं कथंचन । अमानुषाणि कर्माणि यस्यैतानि महात्मनः ॥ ४३ ॥ तेन सत्त्ववता संख्ये शूरेणाहवशौभिना । कृतिना समरे राजन् संधिर्भवतु मा चिरम् ॥ ४४ ॥ ‘तात! पाण्डुपुत्र अर्जुनको युद्धमें किसी प्रकार भी जीतना असम्भव है। जिन महामनस्वी पुरुषके ये अलौकिक कर्म प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं; जो धैर्यवान्, युद्धमें शूरता दिखानेवाले तथा संग्राममें सुशोभित होनेवाले हैं, राजन्! उन अस्त्र-विद्याके विद्वान् अर्जुनके साथ इस समरभूमिमें तुम्हारी शीघ्र संधि हो जानी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो ॥ ४३-४४ ॥
यावत् कृष्णो महाबाहुः स्वाधीनः कुरुसत्तम । तावत् पार्थेन शूरेण संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४५ ॥ ‘तात! कुरुश्रेष्ठ! जबतक महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोगोंके प्रेमके अधीन हैं, तभीतक शूरवीर अर्जुनके साथ तुम्हारी संधि हो जाय तो ठीक है ॥ ४५ ॥
यावन्न ते चमूः सर्वाः शरैः संनतपर्वभिः । नाशयत्यर्जुनस्तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४६ ॥ ‘तात! जबतक अर्जुन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा तुम्हारी सारी सेनाका विनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये ॥ ४६ ॥
यावत् तिष्ठन्ति समरे हतशेषाः सहोदराः । नृपाश्च बहवो राजंस्तावत् संधिः प्रयुज्यताम् ॥ ४७ ॥ ‘राजन्! इस समरभूमिमें मरनेसे बचे हुए तुम्हारे सहोदर भाई जबतक मौजूद हैं और जबतक बहुत-से नरेश भी जीवन धारण कर रहे हैं, तभीतक तुम अर्जुनके साथ संधि कर लो ॥ ४७ ॥
न निर्दहति ते यावत् क्रोधदीप्तेक्षणश्चमूम् । युधिष्ठिरो रणे तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४८ ॥ ‘तात! जबतक युधिष्ठिर रणभूमिमें क्रोधसे प्रज्वलितनेत्र होकर तुम्हारी सारी सेनाको भस्म नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हें संधि कर लेनी चाहिये ॥ ४८ ॥
नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पाण्डवः ।
यावच्चमूं महाराज नाशयन्ति न सर्वशः ॥ ४९ ॥ तावत् ते पाण्डवैर्वीरैः सौहार्दं मम रोचते । युद्धं मदन्तमेवास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५० ॥ ‘महाराज! नकुल-सहदेव तथा पाण्डुपुत्र भीमसेन—ये सब मिलकर जबतक तुम्हारी सेनाका सर्वनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक पाण्डववीरोंके साथ तुम्हारा सौहार्द स्थापित हो जाय, यही मुझे अच्छा लगता है। तात! मेरे साथ ही इस युद्धका भी अन्त हो जाय। तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।। ४९-५० ।।
एतत् तु रोचतां वाक्यं यदुक्तोऽसि मयानघ । एतत् क्षेममहं मन्ये तव चैव कुलस्य च ॥ ५१ ॥ ‘अनघ! मैंने जो बातें तुमसे कही हैं, वे तुम्हें रुचिकर प्रतीत हों। मैं संधिको ही तुम्हारे तथा कौरवकुलके लिये कल्याणकारी मानता हूँ ॥ ५१ ॥
त्यक्त्वा मन्युं व्युपशाम्यस्व पार्थैः पर्याप्तमेतद् यत् कृतं फाल्गुनेन । भीष्मस्यान्तादस्तु वः सौहृदं च जीवन्तु शेषाः साधु राजन् प्रसीद ॥ ५२ ॥ ‘राजन्! तुम क्रोध छोड़कर कुन्तीकुमारोंके साथ संधि स्थापित कर लो। अर्जुनने आजतक जो कुछ किया है, उतना ही बहुत है। मुझ भीष्मके जीवनका अन्त होनेसे (तुम्हारे वैरका भी अन्त हो जाय) तुमलोगोंमें प्रेम-सम्बन्ध स्थापित हो और जो लोग मरनेसे बचे हैं, वे अच्छी तरह जीवित रहें। इसके लिये तुम प्रसन्न हो जाओ ।। ५२ ।।
राज्यस्यार्धं दीयतां पाण्डवाना- मिन्द्रप्रस्थं धर्मराजोऽभियातु । मा मित्रध्रुक् पार्थिवानां जघन्यः पापां कीर्तिं प्राप्स्यसे कौरवेन्द्र ॥ ५३ ॥ ‘तुम पाण्डवोंका आधा राज्य दे दो। धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ चले जायें। कौरवराज! ऐसा करनेसे तुम राजाओंमें मित्रद्रोही और नीच नहीं कहलाओगे तथा तुम्हें पापपूर्ण अपयश नहीं प्राप्त होगा ।। ५३ ।।
ममावसानाच्छान्तिरस्तु प्रजानां संगच्छन्तां पार्थिवाः प्रीतिमन्तः । पिता पुत्रं मातुलं भागिनेयो भ्राता चैव भ्रातरं प्रैतु राजन् ॥ ५४ ॥ ‘राजन्! मेरे जीवनका अन्त होनेसे प्रजाओंमें शान्ति हो जाय। सब राजा प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरेसे मिलें। पिता पुत्रसे, भानजा मामासे और भाई भाईसे मिले ।। ५४ ।।
न चेदेवं प्राप्तकालं वचो मे
मोहाविष्टः प्रतिपत्स्यस्यबुद्ध्या । तप्स्यस्यन्ते एतदन्ताः स्थ सर्वे सत्यामेतां भारतीमीरयामि ॥ ५५ ॥ 'दुर्योधन! यदि तुम मोहवश अपनी मूर्खताके कारण मेरे इस समयोचित वचनको नहीं मानोगे तो अन्तमें पछताओगे और इस युद्धमें ही तुम सब लोगोंका अन्त हो जायगा। यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ' ॥ ५५ ॥
एतद् वाक्यं सौहृदादापगेयो मध्ये राज्ञां भारतं श्रावयित्वा । तूष्णीमासीच्छल्यसंतप्तमर्मा योज्यात्मानं वेदनां संनियम्य ॥ ५६ ॥ गंगानन्दन भीष्म समस्त राजाओंके बीच सौहार्दवश दुर्योधनको यह बात सुनाकर मौन हो गये। बाणोंसे उनके मर्मस्थलोंमें अत्यन्त पीड़ा हो रही थी। उन्होंने उस व्यथाको किसी प्रकार काबूमें करके अपने मनको परमात्माके चिन्तनमें लगा दिया ॥ ५६ ॥
संजय उवाच
धर्मार्थसहितं वाक्यं श्रुत्वा हितमनामयम् । नारोचयत पुत्रस्ते मुमूर्षुरिव भेषजम् ॥ ५७ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! जैसे मरणासन्न पुरुषको कोई दवा अच्छी नहीं लगती है, उसी प्रकार महात्मा भीष्मका वह धर्म और अर्थसे युक्त परम हितकर और निर्दोष वचन भी आपके पुत्रको पसंद नहीं आया ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दुर्योधनं प्रति भीष्मवाक्ये एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें दुर्योधनके प्रति भीष्मका कथनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
संजय उवाच
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्वानालयान् पुनः ।
तूष्णीम्भूते महाराज भीष्मे शान्तनुनन्दने ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! शान्तनुनन्दन भीष्मके चुप हो जानेपर सब राजा वहाँसे उठकर अपने-अपने विश्रामस्थानको चले गये ॥ १ ॥
श्रुत्वा तु निहतं भीष्मं राधेयः पुरुषर्षभः ।
ईषदागतसंत्रासस्त्वरयोपजगाम ह ॥ २ ॥
भीष्मजीको रथसे गिराया गया सुनकर पुरुषप्रवर राधानन्दन कर्णके मनमें कुछ भय समा गया। वह बड़ी उतावलीके साथ उनके पास आया ॥ २ ॥
स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा ।
जन्मशय्यागतं वीरं कार्तिकेयमिव प्रभुम् ॥ ३ ॥
उस समय उसने देखा, महात्मा भीष्म शरशय्यापर सो रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे वीरवर भगवान् कार्तिकेय जन्मकालमें शरशय्या (सरकण्डोंके बिछावन)-पर सोये थे ॥ ३ ॥
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषः ।
भीष्म भीष्म महाबाहो इत्युवाच महाद्युतिः ॥ ४ ॥
राधेयोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यमक्षिगतस्तव ।
द्वेष्योऽहं तव सर्वत्र इति चैनमुवाच ह ॥ ५ ॥
वीर भीष्मके नेत्र बंद थे। उन्हें देखकर महातेजस्वी कर्णकी आँखोंमें आँसू छलक आये और अश्रुगद्गदकण्ठ होकर उसने कहा—'भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कुरुश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूँ, जो सदा आपकी आँखोंमें गड़ा रहता था और जिसे आप सर्वत्र द्वेषदृष्टिसे देखते थे।' कर्णने यह बात उनसे कही ॥ ४-५ ॥
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धो हि बली संवृतलोचनः ।
शनैरूद्धीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
रहितं धिष्ण्यमालोक्य समुत्सार्य च रक्षिणः ।
पितेव पुत्रं गाङ्गेयः परिरभ्यैकपाणिना ॥ ७ ॥
उसकी बात सुनकर बंद नेत्रोंवाले बलवान् कुरुवृद्ध भीष्मने धीरेसे आँखें खोलकर देखा और उस स्थानको एकान्त देख पहरेदारोंको दूर हटाकर एक हाथसे कर्णका उसी
प्रकार सस्नेह आलिंगन किया, जैसे पिता अपने पुत्रको गलेसे लगाता है। तत्पश्चात् उन्होंने इस प्रकार कहा— ॥ ६-७ ॥
एह्येहि मे विप्रतीप स्पर्धसे त्वं मया सह ।
यदि मां नाधिगच्छेथा न ते श्रेयो ध्रुवं भवेत् ॥ ८ ॥
'आओ, आओ, कर्ण! तुम सदा मुझसे लाग-डाँट रखते रहे। सदा मेरे साथ स्पर्धा करते रहे। आज यदि तुम मेरे पास नहीं आते तो निश्चय ही तुम्हारा कल्याण नहीं होता ॥ ८ ॥
कौन्तेयस्त्वं न राधेयो न तवाधिरथः पिता ।
सूर्यजस्त्वं महाबाहो विदितो नारदान्मया ॥ ९ ॥
'वत्स! तुम राधाके नहीं, कुन्तीके पुत्र हो। तुम्हारे पिता अधिरथ नहीं हैं। महाबाहो! तुम सूर्यके पुत्र हो। मैंने नारदजीसे तुम्हारा परिचय प्राप्त किया था ॥ ९ ॥
कृष्णद्वैपायनाच्चैव तच्च सत्यं न संशयः ।
न च द्वेषोऽस्ति मे तात त्वयि सत्यं ब्रवीमि ते ॥ १० ॥
'तात! श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे भी तुम्हारे जन्मका वृत्तान्त ज्ञात हुआ था और जो कुछ ज्ञात हुआ, वह सत्य है। इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें द्वेष नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ १० ॥
तेजोवधनिमित्तं तु परुषं त्वाहमब्रुवम् ।
अकस्मात् पाण्डवान् सर्वानवाक्षिपसि सुव्रत ॥ ११ ॥
येनासि बहुशो राज्ञा चोदितः सूतनन्दन ।
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वीर! मैं कभी-कभी तुमसे जो कठोर वचन बोल दिया करता था, उसका उद्देश्य था, तुम्हारे उत्साह और तेजको नष्ट करना; क्योंकि सूतनन्दन! तुम राजा दुर्योधनके उकसानेसे अकारण ही समस्त पाण्डवोंपर बहुत बार आक्षेप किया करते थे ॥ ११ १/२ ॥
जातोऽसि धर्मलोपेन ततस्ते बुद्धिरीदृशी ॥ १२ ॥
नीचाश्रयान्मत्सरेण द्वेषिणी गुणिनामपि ।
तेनासि बहुशो रूक्षं श्रावितः कुरुसंसदि ॥ १३ ॥
'तुम्हारा जन्म (कन्यावस्थामें ही कुन्तीके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण) धर्मलोपसे हुआ है; इसीलिये नीच पुरुषोंके आश्रयसे तुम्हारी बुद्धि इस प्रकार ईर्ष्यावश गुणवान् पाण्डवोंसे भी द्वेष रखनेवाली हो गयी है और इसीके कारण कौरवसभामें मैंने तुम्हें अनेक बार कटुवचन सुनाये हैं ॥ १२-१३ ॥
जानामि समरे वीर्यं शत्रुभिर्दुःसहं भुवि ।
ब्रह्मण्यतां च शौर्यं च दाने च परमां स्थितिम् ॥ १४ ॥
'मैं जानता हूँ, तुम्हारा पराक्रम समरभूमिमें शत्रुओंके लिये दुःसह है। तुम ब्राह्मणभक्त, शूरवीर तथा दानमें उत्तम निष्ठा रखनेवाले हो ॥ १४ ॥
न त्वया सदृशः कश्चित् पुरुषेष्वमरोपम । कुलभेदभयाच्चाहं सदा परुषमुक्तवान् ॥ १५ ॥ ‘देवोपम वीर! मनुष्योंमें तुम्हारे समान कोई नहीं है। मैं सदा अपने कुलमें फूट पड़नेके डरसे तुम्हें कटुवचन सुनाता रहा ॥ १५ ॥ इष्वस्त्रे चास्त्रसंधाने लाघवेऽस्त्रबले तथा । सदृशः फाल्गुनेनासि कृष्णेन च महात्मना ॥ १६ ॥ ‘बाण चलाने, दिव्यास्त्रोंका संधान करने, फुर्ती दिखाने तथा अस्त्रबलमें तुम अर्जुन तथा महात्मा श्रीकृष्णके समान हो ॥ १६ ॥ कर्ण काशिपुरं गत्वा त्वयैकेन धनुष्मता । कन्यार्थे कुरुराजस्य राजानो मृदिता युधि ॥ १७ ॥ ‘कर्ण! तुमने कुरुराज दुर्योधनके लिये कन्या लानेके निमित्त अकेले काशीपुरमें जाकर केवल धनुषकी सहायतासे वहाँ आये हुए समस्त राजाओंको युद्धमें परास्त कर दिया था ॥ १७ ॥ तथा च बलवान् राजा जरासंधो दुरासदः । समरे समरश्लाघिन् न त्वया सदृशोऽभवत् ॥ १८ ॥ ‘युद्धकी श्लाघा रखनेवाले वीर! यद्यपि राजा जरासंध दुर्जय एवं बलवान् था, तथापि वह रणभूमिमें तुम्हारी समानता न कर सका ॥ १८ ॥ ब्रह्मण्यः सत्त्वयोधी च तेजसा च बलेन च । देवगर्भसमः संख्ये मनुष्यैरधिको युधि ॥ १९ ॥ ‘तुम ब्राह्मणभक्त, धैर्यपूर्वक युद्ध करनेवाले तथा तेज और बलसे सम्पन्न हो। संग्रामभूमिमें देवकुमारोंके समान जान पड़ते हो और प्रत्येक युद्धमें मनुष्योंसे अधिक पराक्रमी हो ॥ १९ ॥ व्यपनीतोऽद्य मन्युर्मे यस्त्वां प्रति पुरा कृतः । दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २० ॥ ‘मैंने पहले जो तुम्हारे प्रति क्रोध किया था, वह अब दूर हो गया है; क्योंकि प्रारब्धके विधानको कोई पुरुषार्थद्वारा नहीं टाल सकता ॥ २० ॥ सोदर्याः पाण्डवा वीरा भ्रातरस्तेऽरिसूदन । संगच्छ तैर्महाबाहो मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ २१ ॥ ‘शत्रुसूदन! वीर पाण्डव तुम्हारे सगे भाई हैं। महाबाहो! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अपने उन भाइयोंसे मिल जाओ ॥ २१ ॥ मया भवतु निर्वृत्तं वैरमादित्यनन्दन । पृथिव्यां सर्वराजानो भवन्त्वद्य निरामयाः ॥ २२ ॥
'सूर्यनन्दन! मेरी मृत्युके द्वारा ही यह वैरकी आग बुझ जाय और भूमण्डलके समस्त नरेश अब दुःख-शोकसे रहित एवं निर्भय हो जायँ' ॥ २२ ॥
कर्ण उवाच
जानाम्येव महाबाहो सर्वमेतन्न संशयः ।
यथा वदसि मे भीष्म कौन्तेयोऽहं न सूतजः ॥ २३ ॥
कर्णने कहा— महाबाहो! भीष्म! आप जो कुछ कह रहे हैं, उसे मैं भी जानता हूँ। यह सब ठीक है, इसमें संशय नहीं है। वास्तवमें मैं कुन्तीका ही पुत्र हूँ, सूतपुत्र नहीं हूँ ॥ २३ ॥
अवकीर्णस्त्वहं कुन्त्या सूतेन च विवर्धितः ।
(पुरा दुर्योधनेनाहं स्नेहं वै कृतवान् मुदा ।
तव कार्यं करिष्यामि यद् यत् सर्वं दुरासदम् ॥
इत्येवं वै प्रतिज्ञातं वचनं वै सुयोधने ।)
भुक्त्वा दुर्योधनैश्वर्यं न मिथ्याकर्तुमुत्सहे ॥ २४ ॥
परंतु माता कुन्तीने तो मुझे पानीमें बहा दिया और सूतने मुझे पाल-पोषकर बड़ा किया। पूर्वकालसे ही मैं दुर्योधनके साथ स्नेह करता आया हूँ और प्रसन्नतापूर्वक रहा हूँ। दुर्योधनसे मैंने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि तुम्हारा जो-जो दुष्कर कार्य होगा, वह सब मैं पूरा करूँगा। दुर्योधनका ऐश्वर्य भोगकर मैं उसे निष्फल नहीं कर सकता ॥ २४ ॥
वसुदेवसुतो यद्वत् पाण्डवाय दृढव्रतः ।
वसु चैव शरीरं च पुत्रदारं तथा यशः ॥ २५ ॥
सर्वं दुर्योधनस्यार्थे त्यक्तं मे भूरिदक्षिण ।
मा चैतद् व्याधिमरणं क्षत्रं स्यादिति कौरव ॥ २६ ॥
कोपिताः पाण्डवा नित्यं समाश्रित्य सुयोधनम् ।
जैसे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण पाण्डुपुत्र अर्जुनकी सहायताके लिये दृढ़प्रतिज्ञ हैं, उसी प्रकार मेरे धन, शरीर, स्त्री, पुत्र तथा यश सब कुछ दुर्योधनके लिये निछावर हैं। यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुरुनन्दन भीष्म! मैंने दुर्योधनका आश्रय लेकर पाण्डवोंका क्रोध सदा इसलिये बढ़ाया है कि यह क्षत्रिय-जाति रोगोंका शिकार होकर न मरे (युद्धमें वीर गति प्राप्त करे) ॥
अवश्यंभावी ह्यर्थोऽयं यो न शक्यो निवर्तितुम् ॥ २७ ॥
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ।
यह युद्ध अवश्यम्भावी है। इसे कोई टाल नहीं सकता। भला, दैवको पुरुषार्थके द्वारा कौन मिटा सकता है ॥ २७ ½ ॥
पृथिवीक्षयशंसीनि निमित्तानि पितामह ॥ २८ ॥
भवद्भिरुपलब्धानि कथितानि च संसदि ।
पितामह! आपने भी तो ऐसे निमित्त (लक्षण) देखे थे, जो भूमण्डलके विनाशकी सूचना देनेवाले थे। आपने कौरवसभामें उनका वर्णन भी किया था॥ २८ १/२ ॥
पाण्डवा वासुदेवश्च विदिता मम सर्वशः ॥ २९ ॥
अजेयाः पुरुषैरन्यैरिति तांश्चोत्सहामहे ।
विजयिष्ये रणे पाण्डूनिति मे निश्चितं मनः ॥ ३० ॥
पाण्डवों तथा भगवान् वासुदेवको मैं सब प्रकारसे जानता हूँ, वे दूसरे पुरुषोंके लिये सर्वथा अजेय हैं, तथापि मैं उनसे युद्ध करनेका उत्साह रखता हूँ और मेरे मनका यह निश्चित विश्वास है कि मैं युद्धमें पाण्डवोंको जीत लूँगा ॥ २९-३० ॥
न च शक्यमवस्रष्टुं वैरमेतत् सुदारुणम् ।
धनंजयेन योत्स्येऽहं स्वधर्मप्रीतमानसः ॥ ३१ ॥
पाण्डवोंके साथ हमलोगोंका यह वैर अत्यन्त भयंकर हो गया है। अब इसे दूर नहीं किया जा सकता। मैं अपने धर्मके अनुसार प्रसन्नचित्त होकर अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा ॥ ३१ ॥
अनुजानीष्व मां तात युद्धाय कृतनिश्चयम् ।
अनुज्ञातस्त्वया वीर युद्ध्येयमिति मे मतिः ॥ ३२ ॥
तात! मैं युद्धके लिये निश्चय कर चुका हूँ। वीर! मेरा विचार है कि आपकी आज्ञा लेकर युद्ध करूँ; अतः आप मुझे इसके लिये आज्ञा देनेकी कृपा करें ॥ ३२ ॥
दुरुक्तं विप्रतीपं वा रभसाच्चापलात् तथा ।
यन्मयेह कृतं किंचित् तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ३३ ॥
मैंने क्रोधके आवेगसे अथवा चपलताके कारण यहाँ जो कुछ आपके प्रति कटुवचन कहा हो या आपके प्रतिकूल आचरण किया हो, वह सब आप कृपापूर्वक क्षमा कर दें ॥ ३३ ॥
भीष्म उवाच
न चेच्छक्यमवस्रष्टुं वैरमेतत् सुदारुणम् ।
अनुजानामि कर्ण त्वां युद्ध्यस्व स्वर्गकाम्यया ॥ ३४ ॥
**भीष्मने कहा—**कर्ण! यदि यह भयंकर वैर अब नहीं छोड़ा जा सकता तो मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम स्वर्गप्राप्तिकी इच्छासे युद्ध करो ॥ ३४ ॥
निर्मन्युर्गतसंरम्भः कृतकर्मा रणे स्म ह ।
यथाशक्ति यथोत्साहं सतां वृत्तेषु वृत्तवान् ॥ ३५ ॥
दीनता और क्रोध छोड़कर अपनी शक्ति और उत्साहके अनुसार सत्पुरुषोंके आचारमें स्थित रहकर युद्ध करो। तुम रणक्षेत्रमें पराक्रम कर चुके हो और आचारवान् तो हो ही ॥ ३५ ॥
अहं त्वामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि । क्षत्रधर्मजिताँल्लोकानवाप्स्यसि धनंजयात् ॥ ३६ ॥ कर्ण! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम जो चाहते हो, वह प्राप्त करो। धनंजयके हाथसे मारे जानेपर तुम्हें क्षत्रियधर्मके पालनसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी उपलब्धि होगी ॥ ३६ ॥ युध्यस्व निरहङ्कारो बलवीर्यव्यपाश्रयः । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३७ ॥ तुम अभिमानशून्य होकर बल और पराक्रमका सहारा ले युद्ध करो, क्षत्रियके लिये धर्मानुकूल युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं है ॥ ३७ ॥ प्रशमे हि कृतो यत्नः सुमहान् सुचिरं मया । न चैव शक्तितः कर्तुं कर्ण सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३८ ॥ कर्ण! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। मैंने कौरवों और पाण्डवोंमें शान्ति स्थापित करनेके लिये दीर्घकालतक महान् प्रयत्न किया था; किंतु मैं उसमें कृतकार्य न हो सका ॥ ३८ ॥
संजय उवाच इत्युक्तवति गाङ्गेये अभिवाद्योपमन्त्र्य च । राधेयो रथमारुह्य प्रायात् तव सुतं प्रति ॥ ३९ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! गंगानन्दन भीष्मके ऐसा कहनेपर राधानन्दन कर्ण उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले रथपर आरूढ़ हो आपके पुत्र दुर्योधनके पास चला गया ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मकर्णसंवादे द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-कर्णसंवादविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।]
॥ भीष्मपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुल योग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ५६१०॥ | (२९९॥) | ४११॥।- | ६०२२।- |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ७१॥ | (४॥) | ६≡ | ७७॥≡ |
| भीष्मपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या | ६१०० |
श्रवणमहिमा
वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् बहुवृत्तान्तं भीष्मपर्वाखिलं मया ।
शृण्वते ते महाराज प्रोक्तं पापहरं शुभम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! बहुत-से वृत्तान्तोंसे भरा हुआ यह सम्पूर्ण भीष्मपर्व मैंने तुमसे कहा है और तुमने श्रोता बनकर सुना है। यह पर्व सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला और शुभ है ॥ १ ॥
यः श्रावयेत् सदा राजन् ब्राह्मणान् वेदपारगान् ।
श्रद्धावन्तश्च ये चापि श्रोष्यन्ति मनुजा भुवि ॥ २ ॥
विधूय सर्वपापानि विहायान्ते कलेवरम् ।
प्रयान्ति तत् पदं विष्णोर्यत् प्राप्य न निवर्तते ॥ ३ ॥
राजन्! जो सदा वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पर्वकी कथा सुनायेगा और जो मनुष्य इस भूतलपर श्रद्धापूर्वक इस पर्वको सुनेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके अन्तमें यह शरीर छोड़कर भगवान् विष्णुके उस परमपदको प्राप्त कर लेंगे, जहाँ जाकर जीव इस जगत्में नहीं लौटता है ॥ २-३ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भारतं भरतर्षभ ।
शृणुयात् सिद्धिमन्विच्छन्निह वामुत्र मानवः ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! अतः इस लोक या परलोकमें सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य पूर्ण प्रयत्नपूर्वक महाभारतको अवश्य सुने ॥ ४ ॥
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दद्यात् पानीयमुत्तमम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! भीष्मपर्व सुन लेनेपर मनुष्य ब्राह्मणोंको गन्ध और माल्य आदिसे अलंकृत करके उत्तम भोजन कराये तथा पवित्र जलका दान करे ॥ ५ ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
| महाभारत-सार |
|---|
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥
‘मनुष्य इस जगत्में हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके संयोग-वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे।’
हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
‘अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।’
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥
‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते!’
न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्
धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये
जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥
‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य।’
इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
‘यह महाभारतका सारभूत उपदेश ‘भारत-सावित्री’ के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।’
गीताप्रेस गोरखपुर
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