महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोकमें आपकी निन्दा हो रही है और पुनः परलोकमें भी आपको पापमय नरकका दुःख भोगना पड़ेगा ॥ १६ ॥
स त्वमर्थं संशयितं विना तै- राशंससे पुत्रवशानुगोऽस्य । अधर्मशब्दश्च महान् पृथिव्यां नेदं कर्म त्वत्समं भारताग्र्य ॥ १७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! आप इस समय अपने पुत्रोंके वशमें होकर पाण्डवोंको अलग करके अकेले उनकी सारी सम्पत्ति ले लेना चाहते हैं; पहले तो इसकी सफलतामें ही संदेह है। (और यदि आप सफल हो भी जायँ तो) इस भूमण्डलमें इस अधर्मके कारण आपकी बड़ी भारी निन्दा होगी। अतः यह कार्य कदापि आपके योग्य नहीं है ॥ १७ ॥
हीनप्रज्ञो दुष्कुलेयो नृशंसो दीर्घ वैरी क्षत्रविद्यास्वधीरः । एवंधर्मानापदः संश्रयेयु- र्हीनवीर्यो यश्च भवेदशिष्टः ॥ १८ ॥
जो लोग बुद्धिहीन, नीच कुलमें उत्पन्न, क्रूर, दीर्घकालतक वैरभाव बनाये रखनेवाले, क्षत्रियोचित युद्धविद्यामें अनभिज्ञ, पराक्रमहीन और अशिष्ट होते हैं, ऐसे ही स्वभावके लोगोंपर आपत्तियाँ आती हैं ॥ १८ ॥
कुले जातो बलवान् यो यशस्वी बहुश्रुतः सुखजीवी यतात्मा । धर्माधर्मौ ग्रथितौ यो बिभर्ति स ह्यस्य दिष्टस्य वशादुपैति ॥ १९ ॥
जो कुलीन, बलवान्, यशस्वी, बहुज्ञ विद्वान्, सुखजीवी और मनको वशमें रखनेवाला है तथा जो परस्पर गुँथे हुए धर्म और अधर्मको धारण करता है, वही भाग्यवश अभीष्ट गुण-सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ १९ ॥
कथं हि मन्त्राग्र्यधरो मनीषी धर्मार्थयोरापदि सम्प्रणेता । एवं युक्तः सर्वमन्त्रैर्हीनो नरो नृशंसं कर्म कुर्यादमूढः ॥ २० ॥
आप श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाले हैं, स्वयं भी बुद्धिमान् हैं, आपत्तिकालमें धर्म और अर्थका उचित-रूपसे प्रयोग करते हैं, सब प्रकारकी अच्छी सलाहोंसे भी आप युक्त हैं। फिर आप-जैसे साधनसम्पन्न विद्वान् पुरुष ऐसा क्रूरतापूर्ण कार्य कैसे कर सकते हैं? ॥ २० ॥
तव ह्यमी मन्त्रविदः समेत्य