भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 235

समासते कर्मसु नित्ययुक्ताः । तेषामयं बलवान् निश्चयश्च कुरुक्षये नियमेनोदपादि ॥ २१ ॥ सदा कर्मोंमें नियुक्त किये हुए ये आपके मन्त्रवेत्ता मन्त्री कर्ण आदि एकत्र होकर बैठक किया करते हैं। इन्होंने (पाण्डवोंको राज्य न देनेका) जो प्रबल निश्चय कर लिया है, यह अवश्य ही कौरवोंके भावी विनाशका कारण बन गया है ॥ २१ ॥

अकालिकं कुरवो नाभविष्यन् पापेन चेत् पापमजातशत्रुः । इच्छेज्जातु त्वयि पापं विसृज्य निन्दा चेयं तव लोकेऽभविष्यत् ॥ २२ ॥ राजन्! यदि अजातशत्रु युधिष्ठिर (आपको ही दोषी ठहराकर) आपपर ही सारे पापों (दोषों)-का भार डालकर (आपकी ही भाँति) पापके बदले पाप करनेकी इच्छा कर लें तो सारे कौरव असमयमें ही नष्ट हो जायँ और संसारमें केवल आपकी निन्दा फैल जाय ॥ २२ ॥

किमन्यत्र विषयादीश्वराणां यत्र पार्थः परलोकं स्म द्रष्टुम् । अत्यक्रामत् स तथा सम्मतः स्या- न्न संशयो नास्ति मनुष्यकारः ॥ २३ ॥ ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो लोकपालोंके अधिकार-से बाहर हो? तभी तो अर्जुन (इन्द्रकील पर्वतपर लोकपालोंसे मिलकर एवं उनसे अस्त्र प्राप्त करके भू और भुवर्लोकको लाँघकर) स्वर्गलोकको देखनेके लिये गये थे। इस प्रकार लोकपालोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी यदि उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है तो निस्सन्देह यह कहा जा सकता है कि दैवबलके सामने मनुष्यका पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है ॥ २३ ॥

एतान् गुणान् कर्मकृतानवेक्ष्य भावाभावौ वर्तमानावनित्यौ । बलिर्हि राजा पारमविन्दमानो नान्यत् कालात् कारणं तत्र मेने ॥ २४ ॥ ये शौर्य, विद्या आदि गुण अपने पूर्वकर्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं और प्राणियोंकी वर्तमान उन्नति तथा अवनति भी अनित्य हैं। यह सब सोचकर राजा बलिने जब इसका पार नहीं पाया, तब यही निश्चय किया कि इस विषयमें काल (दैव)-के सिवा और कोई कारण नहीं है ॥ २४ ॥

चक्षुःश्रोत्रे नासिका त्वक् च जिह्वा ज्ञानस्यैतान्यायतनानि जन्तोः ।

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