महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मार्थनित्याश्च बहुश्रुताश्च । पृच्छामि त्वां विदुर प्रश्नमेतं भवन्ति वै कानि महाकुलानि ॥ २२ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—विदुर! धर्म और अर्थके अनुष्ठानमें परायण एवं बहुश्रुत देवता भी उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुषोंकी इच्छा करते हैं। इसलिये मैं तुमसे यह प्रश्न करता हूँ कि महान् (उत्तम) कुलीन कौन हैं? ॥ २२ ॥
विदुर उवाच
तपो दमो ब्रह्मवित्तं वितानाः पुण्या विवाहाः सततान्नदानम् । येष्वेवैते सप्त गुणा वसन्ति सम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि ॥ २३ ॥ विदुरजी बोले—राजन्! जिनमें तप, इन्द्रियसंयम, वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ, पवित्र विवाह, सदा अन्नदान और सदाचार—ये सात गुण वर्तमान हैं, उन्हें महान् (उत्तम) कुलीन कहते हैं ॥ २३ ॥
येषां हि वृत्तं व्यथते न योनि- श्चित्तप्रसादेन चरन्ति धर्मम् । ते कीर्तिमिच्छन्ति कुले विशिष्टां त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि ॥ २४ ॥ जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता, जो अपने दोषोंसे माता-पिताको कष्ट नहीं पहुँचाते, प्रसन्नचित्तसे धर्मका आचरण करते हैं तथा असत्यका परित्याग कर अपने कुलकी विशेष कीर्ति चाहते हैं, वे ही महान् कुलीन हैं ॥ २४ ॥
अनिज्यया कुविवाहैर्वेदस्योत्सादनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति धर्मस्यातिक्रमेण च ॥ २५ ॥ यज्ञ न होनेसे, निन्दित कुलमें विवाह करनेसे, वेदका त्याग और धर्मका उल्लंघन करनेसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं ॥ २५ ॥
देवद्रव्यविनाशेन ब्रह्मस्वहरणेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ २६ ॥ देवताओंके धनका नाश, ब्राह्मणके धनका अपहरण और ब्राह्मणोंकी मर्यादाका उल्लंघन करनेसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं ॥ २६ ॥
ब्राह्मणानां परिभवात् परिवादाच्च भारत । कुलान्यकुलतां यान्ति न्यासापहरणेन च ॥ २७ ॥