महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारत! ब्राह्मणोंके अनादर और निन्दासे तथा धरोहर रखी हुई वस्तुको छिपा लेनेसे अच्छे कुल भी निन्दनीय हो जाते हैं॥ २७॥ कुलानि समुपेतानि गोभिः पुरुषतोऽर्थतः। कुलसंख्यां न गच्छन्ति यानि हीनानि वृत्ततः॥ २८॥ गौओं, मनुष्यों और धनसे सम्पन्न होकर भी जो कुल सदाचारसे हीन हैं, वे अच्छे कुलोंकी गणनामें नहीं आ सकते॥ २८॥ वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि। कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद् यशः॥ २९॥ थोड़े धनवाले कुल भी यदि सदाचारसे सम्पन्न हैं तो वे अच्छे कुलोंकी गणनामें आ जाते हैं और महान् यश प्राप्त करते हैं॥ २९॥ वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च। अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ ३०॥ सदाचारकी रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये; धन तो आता और जाता रहता है। धन क्षीण हो जानेपर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता; किंतु जो सदाचारसे भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझना चाहिये॥ ३०॥ गोभिः पशुभिरश्वैश्च कृष्या च सुसमृद्धया। कुलानि न प्ररोहन्ति यानि हीनानि वृत्ततः॥ ३१॥ जो कुल सदाचारसे हीन हैं, वे गौओं, पशुओं, घोड़ों तथा हरी-भरी खेतीसे सम्पन्न होनेपर भी उन्नति नहीं कर पाते॥ ३१॥ मा नः कुले वैरकृत् कश्चिदस्तु राजामात्यो मा परस्वापहारी। मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्यः॥ ३२॥ हमारे कुलमें कोई वैर करनेवाला न हो, दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाला राजा अथवा मन्त्री न हो और मित्रद्रोही, कपटी तथा असत्यवादी न हो। इसी प्रकार माता-पिता, देवता एवं अतिथियों-को भोजन करानेसे पहले भोजन करनेवाला भी न हो॥ ३२॥ यश्च नो ब्राह्मणान् हन्याद् यश्च नो ब्राह्मणान् द्विषेत्। न नः स समितिं गच्छेद यश्च नो निर्वपेत् पितॄन्॥ ३३॥ हमलोगोंमेंसे जो ब्राह्मणोंकी हत्या कर, ब्राह्मणोंके साथ द्वेष करे तथा पितरोंको पिण्डदान एवं तर्पण न करे, वह हमारी सभामें न प्रवेश करे॥ ३३॥ तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता। सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ ३४॥