महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 349, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमूढवृत्तेः पुरुषस्येह कुर्यात् किं वै मृत्युस्तार्ण इवास्य व्याघ्रः। अमन्यमानः क्षत्रिय किंचिदन्य- न्नाधीयीत निर्णुदन्निवास्य चायुः॥ १५ ॥ जिसके चित्तकी वृत्तियाँ विषयभोगोंसे मोहित नहीं हुई हैं, उस ज्ञानी पुरुषका इस लोकमें तिनकोंके बनाये हुए व्याघ्रके समान मृत्यु क्या बिगाड़ सकती है? इसलिये राजन्! विषयभोगोंके मूल कारणरूप अज्ञानको नष्ट करनेकी इच्छासे दूसरे किसी भी सांसारिक पदार्थको कुछ भी न गिनकर उसका चिन्तन त्याग देना चाहिये ॥ १५ ॥
स क्रोधलोभौ मोहवानन्तरात्मा स वै मृत्युस्त्वच्छरीरे य एषः। एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा ज्ञाने तिष्ठन् न बिभेतीह मृत्योः। विनश्यते विषये तस्य मृत्यु- र्मृत्योर्यथा विषयं प्राप्य मर्त्यः॥ १६ ॥ यह जो तुम्हारे शरीरके भीतर अन्तरात्मा है, मोहके वशीभूत होकर यही क्रोध, लोभ (प्रमाद) और मृत्युरूप हो जाता है। इस प्रकार मोहसे होनेवाली मृत्युको जानकर जो ज्ञाननिष्ठ हो जाता है, वह इस लोकमें मृत्युसे कभी नहीं डरता। उसके समीप आकर मृत्यु उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे मृत्युके अधिकारमें आया हुआ मरणधर्मा मनुष्य ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
यानेवाहुरिज्यया साधुलोकान् द्विजातीनां पुण्यतमान् सनातनान्। तेषां परार्थं कथयन्तीह वेदा एतद् विद्वान् नोपैति कथं नु कर्म ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्र बोले—द्विजातियोंके लिये यज्ञोंद्वारा जिन पवित्रतम सनातन एवं श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है, यहाँ वेद उन्हींको परम पुरुषार्थ कहते हैं। इस बातको जाननेवाला विद्वान् उत्तम कर्मोंका आश्रय क्यों न ले ॥ १७ ॥
सनत्सुजात उवाच
एवं ह्यविद्वानुपयाति तत्र तत्रार्थजातं च वदन्ति वेदाः। अनीह आयाति परं परात्मा प्रयाति मार्गेण निहत्य मार्गान् ॥ १८ ॥