भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 350

सनत्सुजातने कहा— राजन्! अज्ञानी पुरुष इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोकोंमें गमन करता है तथा वेद कर्मके बहुत-से प्रयोजन भी बताते हैं; परंतु जो निष्काम पुरुष है, वह ज्ञानमार्गके द्वारा अन्य सभी मार्गोंका बाध करके परमात्मस्वरूप होता हुआ ही परमात्माको प्राप्त होता है॥ १८॥

धृतराष्ट्र उवाच

कोऽसौ नियुङ्क्ते तमजं पुराणं स चेदिदं सर्वमनुक्रमेण। किं वास्य कार्यमथवा सुखं च तन्मे विद्वन् ब्रूहि सर्वं यथावत्॥ १९॥ धृतराष्ट्र बोले— विद्वन्! यदि वह परमात्मा ही क्रमशः इस सम्पूर्ण जगत्‌के रूपमें प्रकट होता है तो उस अजन्मा और पुरातन पुरुषपर कौन शासन करता है? अथवा उसे इस रूपमें आनेकी क्या आवश्यकता है और क्या सुख मिलता है?—यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइये॥ १९॥

सनत्सुजात उवाच

दोषो महानत्र विभेदयोगे ह्यनादियोगेन भवन्ति नित्याः। तथास्य नाधिक्यमुपैति किंचि- दनादियोगेन भवन्ति पुंसः॥ २०॥ सनत्सुजातने कहा— तुम्हारे इस प्रश्नके अनुसार जीव और ब्रह्मका विशेष भेद प्राप्त होता है, जिसे स्वीकार कर लेनेपर वेदविरोधरूप महान् दोषकी प्राप्ति होती है। अतएव अनादि मायाके सम्बन्धसे जीवोंका कामसुख आदिसे सम्बन्ध होता रहता है। ऐसा होनेपर भी जीवकी महत्ता नष्ट नहीं होती; क्योंकि मायाके सम्बन्धसे जीवके देहादि पुनः उत्पन्न होते रहते हैं॥ २०॥

य एतद् वा भगवान् स नित्यो विकारयोगेन करोति विश्वम्। तथा च तच्छक्तिरिति स्म मन्यते तथार्थयोगे च भवन्ति वेदाः॥ २१॥ जो नित्यस्वरूप भगवान् हैं, वे ही परब्रह्म मायाके सहयोगसे इस विश्वब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं। वह माया उन्हीं परब्रह्मकी शक्ति है। महात्मा पुरुष इसे मानते हैं। इस प्रकारके अर्थके प्रतिपादनमें वेद भी प्रमाण हैं॥ २१॥

धृतराष्ट्र उवाच