महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंविस्मृति, अधिक बकवाद और अपनेको बड़ा समझना—इन दोषोंसे जो मुक्त है, उसीको सत्पुरुष दान्त (जितेन्द्रिय) कहते हैं॥ मदोऽष्टादशदोषः स्यात् त्यागो भवति षड्विधः । विपर्ययाः स्मृता एते मददोषा उदाहृताः ॥ २६ ॥ श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत् । तेन दुःखं तरत्येव भिन्नं तस्मिन् जितं कृते ॥ २७ ॥ मदमें अठारह दोष हैं; ऊपर जो दमके विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मदके दोष बताये गये हैं। त्याग छह प्रकारका होता है, वह छहों प्रकारका त्याग अत्यन्त उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात् कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दुःखोंको निश्चय ही पार कर जाता है। कामका त्याग कर देनेपर सब कुछ जीत लिया जाता है॥ २६-२७॥ श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागः श्रियं प्राप्य न हृष्यति । इष्टापूर्तं द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगतः ॥ २८ ॥ कामत्यागश्च राजेन्द्र स तृतीय इति स्मृतः । अप्यवाच्यं वदन्त्येतं स तृतीयो गुणः स्मृतः ॥ २९ ॥ राजेन्द्र! छह प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं। लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना—यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना—यह तीसरा त्याग कहा गया है। महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं। अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है॥ २८-२९॥ त्यक्तैर्द्रव्यैर्यद् भवति नोपयुक्तैश्च कामतः । न च द्रव्यैस्तद् भवति नोपयुक्तैश्च कामतः ॥ ३० ॥ (वैराग्यपूर्वक) पदार्थोंके त्यागसे जो निष्कामता आती है, वह स्वेच्छापूर्वक उनका उपभोग करनेसे नहीं आती। अधिक धन-सम्पत्तिके संग्रहसे निष्कामता नहीं सिद्ध होती तथा कामनापूर्तिके लिये उसका उपभोग करनेसे भी कामका त्याग नहीं होता॥ ३०॥ न च कर्मस्वसिद्धेषु दुःखं तेन च न ग्लपेत् । सर्वैरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत् ॥ ३१ ॥ जो पुरुष सब गुणोंसे युक्त और धनवान् हो, यदि उसके किये हुए कर्म सिद्ध न हों तो उनके लिये दुःख एवं ग्लानि न करे॥ ३१॥ अप्रिये च समुत्पन्ने व्यथां जातु न गच्छति । इष्टान् पुत्रांश्च दारांश्च न याचेत कदाचन ॥ ३२ ॥ कोई अप्रिय घटना हो जाय तो कभी व्यथाको न प्राप्त हो (यह चौथा त्याग है)। अपने अभीष्ट पदार्थ—स्त्री-पुत्रादिकी कभी याचना न करे (यह पाँचवाँ त्याग है)॥ ३२॥