महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्हते याचमानाय प्रदेयं तच्छुभं भवेत् । अप्रमादी भवेदेतैः स चाप्यष्टगुणो भवेत् ॥ ३३ ॥ सत्यं ध्यानं समाधानं चोद्यं वैराग्यमेव च । अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च तथा संग्रहमेव च ॥ ३४ ॥ सुयोग्य याचकके आ जानेपर उसे दान करे (यह छठा त्याग है)। इन सबसे कल्याण होता है। इन त्यागमय गुणोंसे मनुष्य अप्रमादी होता है। उस अप्रमादके भी आठ गुण माने गये हैं—सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ॥ ३३-३४ ॥
एवं दोषा मदस्योक्तास्तान् दोषान् परिवर्जयेत् । तथा त्यागोऽप्रमादश्च स चाप्यष्टगुणो मतः ॥ ३५ ॥ ये आठ गुण त्याग और अप्रमाद दोनोंके ही समझने चाहिये। इसी प्रकार जो मदके अठारह दोष पहले बताये गये हैं, उनका सर्वथा त्याग करना चाहिये। प्रमादके आठ दोष हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये ॥
अष्टौ दोषाः प्रमादस्य तान् दोषान् परिवर्जयेत् । इन्द्रियेभ्यश्च पञ्चभ्यो मनसश्चैव भारत । अतीतानागतेभ्यश्च मुक्त्युपेतः सुखी भवेत् ॥ ३६ ॥ भारत! पाँच इन्द्रियाँ और छठा मन—इनकी अपने-अपने विषयोंमें जो भोगबुद्धिसे प्रवृत्ति होती है, छः तो ये ही प्रमादविषयक दोष हैं और भूतकालकी चिन्ता तथा भविष्यकी आशा—दो दोष ये हैं। इन आठ दोषोंसे मुक्त पुरुष सुखी होता है ॥ ३६ ॥
सत्यात्मा भव राजेन्द्र सत्ये लोकाः प्रतिष्ठिताः । तांस्तु सत्यमुखानाहुः सत्ये ह्यमृतमाहितम् ॥ ३७ ॥ राजेन्द्र! तुम सत्यस्वरूप हो जाओ, सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। वे दम, त्याग और अप्रमाद आदि गुण भी सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हैं; सत्यमें ही अमृतकी प्रतिष्ठा है ॥ ३७ ॥
निवृत्तेनैव दोषेण तपोव्रतमिहाचरेत् । एतद् धातूकृतं वृत्तं सत्यमेव सतां व्रतम् ॥ ३८ ॥ दोषैरेतैर्वियुक्तस्तु गुणैरेतैः समन्वितः । एतत् समृद्धमत्यर्थं तपो भवति केवलम् ॥ ३९ ॥ यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात् प्रब्रवीमि ते । एतत् पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम् ॥ ४० ॥ दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है। मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन्!