महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगालमें जानेवाला, मन्दबुद्धि एवं महामूर्ख सदा मेरे साथ युद्ध करनेके लिये डींग हाँकता रहता है, उस कटुभाषी दुरात्मा सूतपुत्र कर्णको सुनाकर तथा और भी जो-जो राजालोग पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेके लिये बुलाये गये हैं, उन सबको सुनाते हुए तुम कौरवोंकी मण्डलीमें मेरे द्वारा कही हुई सारी बातें मन्त्रियोंसहित धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहना, जिससे वह अच्छी तरह सुन ले'— ।। ३–५ ।।
यथा नूनं देवराजस्य देवाः शुश्रूषन्ते वज्रहस्तस्य सर्वे । तथाशृण्वन् पाण्डवाः सृंजयाश्च किरीटिना वाचमुक्तां समर्थाम् ॥ ६ ॥
जैसे सब देवता वज्रधारी देवराज इन्द्रकी बातें सुनना चाहते हैं, निश्चय ही उसी प्रकार समस्त सृंजय और पाण्डव अर्जुनकी मुझसे कही हुई ओजभरी बातें सुन रहे थे ॥ ६ ॥
इत्यब्रवीदर्जुनो योत्स्यमानो गाण्डीवधन्वा लोहितपद्मनेत्रः । न चेद् राज्यं मुञ्चति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ ७ ॥ अस्ति नूनं कर्म कृतं पुरस्ता- दनिर्वृष्टं पापकं धार्तराष्ट्रैः ।
उस समय गाण्डीवधारी अर्जुन युद्धके लिये उत्सुक जान पड़ते थे। उनके कमलसदृश नेत्र लाल हो गये थे। उन्होंने इस प्रकार कहा—'यदि दुर्योधन अजमीढकुलनन्दन महाराज युधिष्ठिरका राज्य नहीं छोड़ता है तो निश्चय ही धृतराष्ट्रके पुत्रोंका पूर्वजन्ममें किया हुआ कोई ऐसा पापकर्म प्रकट हुआ है, जिसका फल उन्हें भोगना है ॥ ७ १/२ ॥
येषां युद्धं भीमसेनार्जुनाभ्यां तथाश्विभ्यां वासुदेवेन चैव ॥ ८ ॥ शैनेयेन ध्रुवमात्तायुधेन धृष्टद्युम्नेनाथ शिखण्डिना च । युधिष्ठिरेणेन्द्रकल्पेन चैव योऽपध्यानान्निर्दहेद् गां दिवं च ॥ ९ ॥
तभी तो उनका भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण, अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा इन्द्रके समान तेजस्वी उन महाराज युधिष्ठिरके साथ युद्ध होनेवाला है, जो अनिष्टचिन्तन करते ही पृथ्वी तथा स्वर्गलोकको भी भस्म कर सकते हैं ॥ ८-९ ॥
तैश्चेद् योद्धुं मन्यते धार्तराष्ट्रो निर्वृत्तोऽर्थःसकलःपाण्डवानाम् ।