महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 395, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमा तत् कार्षीः पाण्डवस्यार्थहेतो- रुपैहि युद्धं यदि मन्यसे त्वम् ॥ १० ॥ यदि दुर्योधन चाहता है कि इन सब वीरोंके साथ कौरवोंका युद्ध हो तो ठीक है, इससे पाण्डवोंका सारा मनोरथ सिद्ध हो जायगा। तुम केवल पाण्डवोंके लाभके लिये संधि कराने या आधा राज्य दिलानेकी चेष्टा न करना। उस दशामें यदि ठीक समझो तो उससे कह देना—'दुर्योधन! तुम युद्धभूमिमें ही उतरो ॥ १० ॥
यां तां वने दुःखशय्यामवात्सीत् प्रव्राजितः पाण्डवो धर्मचारी । आप्नोतु तां दुःखतराममनर्था- मन्त्यां शय्यां धार्तराष्ट्रः परासुः ॥ ११ ॥ धर्मात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने वनमें निर्वासित होकर जिस दुःखशय्यापर शयन किया है, दुर्योधन अपने प्राणोंका त्याग करके उससे भी अधिक दुःख-दायिनी और अनर्थकारिणी मृत्युकी अन्तिम शय्याको ग्रहण करे ॥ ११ ॥
ह्रिया ज्ञानेन तपसा दमेन शौर्येणाथो धर्मगुप्त्या धनेन । अन्यायवृत्तिः कुरुपाण्डवेया- नध्यातिष्ठेद् धार्तराष्ट्रो दुरात्मा ॥ १२ ॥ अन्यायपूर्ण बर्ताव करनेवाले दुरात्मा दुर्योधनको उचित है कि वह लज्जा, ज्ञान, तपस्या, इन्द्रियसंयम, शौर्य, धर्मरक्षा आदि गुणों तथा धनके द्वारा कौरव-पाण्डवोंपर अधिकार प्राप्त करे (सद्गुणोंद्वारा सबके हृदयको जीते, अन्यायसे शासन करना असम्भव है) ॥ १२ ॥
मायोपधः प्रणिपाचार्जवाभ्यां तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या बलेन । सत्यं ब्रुवन् प्रतिपन्नो नृपो न- स्तितिक्षमाणः क्लिश्यमानोऽतिवेलम् ॥ १३ ॥ हमारे महाराज युधिष्ठिर नम्रता, सरलता, तप, इन्द्रिय-संयम, धर्मरक्षा और बल—इन सभी गुणोंसे सम्पन्न हैं। वे बहुत दिनोंसे अनेक प्रकारके क्लेश उठाते हुए भी सदा सत्य ही बोलते हैं तथा कौरवोंके कपटपूर्ण व्यवहारों तथा वचनोंको सहन करते रहते हैं ॥ १३ ॥
यदा ज्येष्ठः पाण्डवः संशितात्मा क्रोधं यत्तं वर्षपूगान् सुघोरम् । अवस्रष्टा कुरुषूद्वृत्तचेता- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ १४ ॥