भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ॥ ८० ॥ ‘असुरोंका प्राग्ज्योतिषपुर नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर किला था, जो शत्रुओंके लिये सर्वथा अजेय था। वहाँ भूमिपुत्र महाबली नरकासुर निवास करता था, जिसने देवमाता अदितिके सुन्दर मणिमय कुण्डल हर लिये थे॥ न तं देवाः सह शक्रेण शेकुः समागता युधि मृत्योरभीताः । दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य बलं तथैवास्त्रमवारणीयम् ॥ ८१ ॥ जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य न्ययोजयन् दस्युवधाय कृष्णम् । स तत् कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर- मैश्वर्यवान् सिद्धिषु वासुदेवः ॥ ८२ ॥ ‘मृत्युके भयसे रहित देवता इन्द्रके साथ उसका सामना करनेके लिये आये, परंतु नरकासुरको युद्धमें पराजित न कर सके। तब देवताओंने भगवान् श्रीकृष्णके अनिवार्य बल, पराक्रम और अस्त्रको देखकर तथा इनकी दयालु एवं दुष्टदमनकारिणी प्रकृतिको जानकर इन्हींसे पूर्वोक्त डाकू नरकासुरका वध करनेकी प्रार्थना की, तब समस्त कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णने वह दुष्कर कार्य पूर्ण करना स्वीकार किया ।। ८१-८२ ।। निर्मोचने षट् सहस्राणि हत्वा संच्छिद्य पाशान् सहसा क्षुरान्तान् । मुरं हत्वा विनिहत्यौघरक्षो निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ॥ ८३ ॥ ‘फिर वीरवर श्रीकृष्णने निर्मोचन नगरकी सीमापर जाकर सहसा छः हजार लोहमय पाश काट दिये, जो तीखी धारवाले थे। फिर मुर दैत्यका वध और राक्षस-समूहका नाश करके निर्मोचन नगरमें प्रवेश किया ।। ८३ ।। तत्रैव तेनास्य बभूव युद्धं महाबलेनातिबलस्य विष्णोः । शेते स कृष्णेन हतः परासु- र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ॥ ८४ ॥ ‘वहीं उस महाबली नरकासुरके साथ अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध हुआ। श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा और आँधीके उखाड़े हुए कनेरवृक्षकी भाँति सदाके लिये रणभूमिमें सो गया ।। ८४ ।। आहृत्य कृष्णो मणिकुण्डले ते हत्वा च भौमं नरकं मुरं च ।