महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रिया वृतो यशसा चैव विद्वान् प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ॥ ८५ ॥ 'इस प्रकार अनुपम प्रभावशाली विद्वान् श्रीकृष्ण भूमिपुत्र नरकासुर तथा मुरका वध करके देवी अदितिके वे दोनों मणिमय कुण्डल वहाँसे लेकर विजयलक्ष्मी और उज्ज्वल यशसे सुशोभित हो अपनी पुरीमें लौट आये ॥ ८५ ॥ अस्मै वराणयददंस्तत्र देवा दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत् । श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या- दाकाशे चाप्सु च ते क्रमः स्यात् ॥ ८६ ॥ शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर- न्नित्येव कृष्णश्च ततः कृतार्थः । एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेये महाबले गुणसम्पत् सदैव ॥ ८७ ॥ 'युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णका वह भयंकर पराक्रम देखकर देवताओंने वहाँ इन्हें इस प्रकार वर दिये—‘केशव! युद्ध करते समय आपको कभी थकावट न हो, आकाश और जलमें भी आप अप्रतिहत गतिसे विचरें और आपके अंगोंमें कोई भी अस्त्र-शस्त्र चोट न पहुँचा सके।' इस प्रकार वर पाकर श्रीकृष्ण पूर्णतः कृतकार्य हो गये हैं। इन असीम शक्तिशाली महाबली वासुदेवमें समस्त गुण-सम्पत्ति सदैव विद्यमान है ॥ ८६-८७ ॥ तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य- माशंसते धार्तराष्ट्रो विजेतुम् । सदा ह्येनं तर्कयते दुरात्मा तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान् समीक्ष्य ॥ ८८ ॥ 'ऐसे अनन्त पराक्रमी और अजेय श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जीत लेनेकी आशा करता है। वह दुरात्मा सदैव इनका अनिष्ट करनेके विषयमें सोचता रहता है, परंतु हमलोगोंकी ओर देखकर उसके इस अपराधको भी ये भगवान् सहते चले जा रहे हैं ॥ ८८ ॥ पर्यागतं मम कृष्णस्य चैव यो मन्यते कलहं सम्प्रसह्य । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं तद् वेदिता संयुगं तत्र गत्वा ॥ ८९ ॥ 'दुर्योधन मानता है कि मुझमें और श्रीकृष्णमें हठात् कलह करा दिया जा सकता है। पाण्डवोंका श्रीकृष्णके प्रति जो ममत्व (अपनापन) है, उसे मिटा दिया जा सकता है; परंतु