महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रकी युद्धभूमिमें पहुँचनेपर उसे इन सब बातोंका ठीक-ठीक पता चल जायगा ॥ ८९ ॥
नमस्कृत्य शान्तनवाय राज्ञे द्रोणायाथो सहपुत्राय चैव । शारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ॥ ९० ॥
'मैं शान्तनुनन्दन महाराज भीष्मको, आचार्य द्रोणको, गुरुभाई अश्वत्थामाको और जिनका सामना कोई नहीं कर सकता, उन वीरवर कृपाचार्यको भी प्रणाम करके राज्य पानेकी इच्छा लेकर अवश्य युद्ध करूँगा ॥ ९० ॥
धर्मेणाप्तं निधनं तस्य मन्ये यो योत्स्यते पाण्डवैः पापबुद्धिः । मिथ्या ग्लहे निर्जिता वै नृशंसैः संवत्सरान् वै द्वादश राजपुत्राः ॥ ९१ ॥
'जो पापबुद्धि मानव पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा, धर्मकी दृष्टिसे उसकी मृत्यु निकट आ गयी है, ऐसा मेरा विश्वास है। कारण कि इन क्रूर स्वभाववाले कौरवोंने हम सब लोगोंको कपटद्यूतमें जीतकर बारह वर्षोंके लिये वनमें निर्वासित कर दिया था; यद्यपि हम भी राजाके ही पुत्र थे ॥ ९१ ॥
वासः कृच्छ्रो विहितश्चाप्यरण्ये दीर्घं कालं चैकमज्ञातवर्षम् । ते हि कस्माज्जीवतां पाण्डवानां नन्दिष्यन्ते धार्तराष्ट्राः पदस्थाः ॥ ९२ ॥
'हम वनमें दीर्घकालतक बड़े कष्ट सहकर रहे हैं और एक वर्षतक हमें अज्ञातवास करना पड़ा है। ऐसी दशामें पाण्डवोंके जीते-जी वे कौरव अपने पदोंपर प्रतिष्ठित रहकर कैसे आनन्द भोगते रहेंगे? ॥ ९२ ॥
ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयु- र्देवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः । धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां- स्ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥ ९३ ॥
'यदि इन्द्र आदि देवताओंकी सहायता पाकर भी धृतराष्ट्रपुत्र हमें युद्धमें जीत लेंगे तो यह मानना पड़ेगा कि धर्मकी अपेक्षा पापाचारका ही महत्त्व अधिक है और संसारसे पुण्यकर्मका अस्तित्व निश्चय ही उठ गया ॥ ९३ ॥
न चेदिमं पुरुषं कर्मबद्धं न चेदस्मान् मन्यतेऽसौ विशिष्टान् ।