भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

बृहस्पतिस्तु पप्रच्छ ब्रह्माणं काविमाविति । भवन्तं नोपतिष्ठेते तौ नः शंस पितामह ॥ ६ ॥ यह देख बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीसे पूछा—'पितामह! ये दोनों कौन हैं, जिन्होंने आपका अभिनन्दन भी नहीं किया। हमें इनका परिचय दीजिये' ॥ ६ ॥

ब्रह्मोवाच यावेतौ पृथिवीं द्यां च भासयन्तौ तपस्विनौ । ज्वलन्तौ रोचमानौ च व्याप्यातीतौ महाबलौ ॥ ७ ॥ नरनारायणावेतौ लोकाल्लोकं समास्थितौ । ऊर्जितौ स्वेन तपसा महासत्त्वपराक्रमौ ॥ ८ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**बृहस्पते! ये जो दोनों महान् शक्तिशाली तपस्वी पृथ्वी और आकाशको प्रकाशित करते हुए हमलोगोंका अतिक्रमण करके आगे बढ़ गये हैं, नर और नारायण हैं। ये अपने तेजसे प्रज्वलित और कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं। इनका धैर्य और पराक्रम महान् है। ये अपनी तपस्यासे अत्यन्त प्रभावशाली होनेके कारण भूलोकसे ब्रह्मलोकमें आये हैं ॥ ७-८ ॥ एतौ हि कर्मणा लोकं नन्दयामासतुर्ध्रुवम् ।