महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विधाभूतौ महाप्राज्ञौ विद्धि ब्रह्मन् परंतपौ । असुराणां विनाशाय देवगन्धर्वपूजितौ ॥ ९ ॥ इन्होंने अपने सत्कर्मोंसे निश्चय ही सम्पूर्ण लोकोंका आनन्द बढ़ाया है। ब्रह्मन्! ये दोनों अत्यन्त बुद्धिमान् और शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं। इन्होंने एक होते हुए भी असुरोंका विनाश करनेके लिये दो शरीर धारण किये हैं। देवता और गन्धर्व सभी इनकी पूजा करते हैं ॥ ९ ॥
वैशम्पायन उवाच
जगाम शक्रस्तच्छ्रुत्वा यत्र तौ तेपतुस्तपः । सार्धं देवगणैः सर्वैर्बृहस्पतिपुरोगमैः ॥ १० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर इन्द्र बृहस्पति आदि सब देवताओंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ उन दोनों ऋषियोंने तपस्या की थी ॥ १० ॥
तदा देवासुरे युद्धे भये जाते दिवौकसाम् । अयाचत महात्मानौ नरनारायणौ वरम् ॥ ११ ॥ उन दिनों देवासुर-संग्राम उपस्थित था और उसमें देवताओंको महान् भय प्राप्त हुआ था; अतः उन्होंने उन दोनों महात्मा नर-नारायणसे वरदान माँगा ॥ ११ ॥
तावब्रूतां वृणीष्वेति तदा भरतसत्तम । अथैतावब्रवीच्छक्रः साह्यं नः क्रियतामिति ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उस समय उन दोनों ऋषियोंने इन्द्रसे कहा—'तुम्हारी जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।' तब इन्द्रने उनसे कहा—'भगवन्! आप हमारी सहायता करें' ॥ १२ ॥
ततस्तौ शक्रमब्रूतां करिष्यावो यदिच्छसि । ताभ्यां च सहितः शक्रो विजिग्ये दैत्यदानवान् ॥ १३ ॥ तब नर-नारायण ऋषियोंने इन्द्रसे कहा—'देवराज! तुम जो कुछ चाहते हो, वह हम करेंगे।' फिर उन दोनोंको साथ लेकर इन्द्रने समस्त दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी ॥ १३ ॥
नर इन्द्रस्य संग्रामे हत्वा शत्रून् परंतपः । पौलोमान् कालखञ्जांश्च सहस्राणि शतानि च ॥ १४ ॥ एक समय शत्रुओंको संताप देनेवाले नरस्वरूप अर्जुनने युद्धमें इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले सैकड़ों और हजारों पौलोम एवं कालखंज नामक दानवोंका संहार किया ॥ १४ ॥
एष भ्रान्ते रथे तिष्ठन् भल्लेनापाहरच्छिरः । जम्भस्य ग्रसमानस्य तदा ह्यर्जुन आहवे ॥ १५ ॥