भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 430

अपश्यत् संजयो नूनं कुन्तीपुत्रान् महारथान् । तैरस्य पुरुषव्याघ्रैर्भृशमुद्वेजितं मनः ॥ १३ ॥ धृतराष्ट्र बोले— निश्चय ही संजयने महारथी कुन्तीपुत्रोंको देखा है। जान पड़ता है, उन पुरुषसिंह पाण्डवोंने इसके मनको अत्यन्त उद्विग्न कर दिया है ॥

वैशम्पायन उवाच

संजयश्चेतनां लब्ध्वा प्रत्याश्वस्येदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रं महाराज सभायां कुरुसंसदि ॥ १४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इतनेमें ही संजयको चेत हो आया और वे आश्वस्त होकर कौरव-सभामें धृतराष्ट्रसे बोले ॥ १४ ॥

संजय उवाच

दृष्टवानस्मि राजेन्द्र कुन्तीपुत्रान् महारथान् । मत्स्यराजगृहावासनिरोधेनावकर्शितान् ॥ १५ ॥ संजयने कहा— राजेन्द्र! मैंने महारथी कुन्तीपुत्रोंका दर्शन किया है। वे अज्ञातवासके समय मत्स्यनरेश विराटके घरमें छिपकर रहनेके कारण अत्यन्त दुबले हो गये हैं ॥ १५ ॥ शृणु यैर्हि महाराज पाण्डवा अभ्ययुञ्जत । धृष्टद्युम्नेन वीरेण युद्धे वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ १६ ॥ महाराज! पाण्डवोंने जिन लोगोंकी सहायता पाकर युद्धके लिये तैयारी की है, उनका परिचय देता हूँ, सुनिये। पहली बात यह है कि उन्हें वीरवर धृष्टद्युम्नका पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है, जिससे सबल होकर उन पाण्डवोंने आपलोगोंपर चढ़ाई करनेकी तैयारी की है ॥ यो नैव रोषान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात् । न हेतुवादाद् धर्मात्मा सत्यं जह्यात् कदाचन ॥ १७ ॥ यः प्रमाणं महाराज धर्मे धर्मभृतां वरः । अजातशत्रुणा तेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ १८ ॥ महाराज! जो धर्मात्मा न रोषसे, न भयसे, न लोभसे, न अर्थके लिये और न बहाना बनाकर ही कभी सत्यका परित्याग कर सकते हैं, जो धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं और धर्मके विषयमें प्रमाण माने जाते हैं, उन अजातशत्रुके प्रभावसे पाण्डवोंने युद्धकी तैयारी की है ॥ यस्य बाहुबले तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । यो वै सर्वान् महीपालान् वशे चक्रे धनुर्धरः । यः काशीनङ्गमगधान् कलिङ्गांश्च युधाजयत् ॥ १९ ॥ तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ।