महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाहुबलमें जिनकी समानता करनेवाला इस भूमण्डलमें दूसरा कोई नहीं है, जिन्होंने केवल धनुष धारण करके युद्धमें काशी, अंग, मगध और कलिंग आदि देशोंके समस्त भूपालोंको जीतकर अपने वशमें कर लिया था, उन भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंपर आक्रमण करनेका उद्योग आरम्भ किया है॥ १९ १/२ ॥
यस्य वीर्येण सहसा चत्वारो भुवि पाण्डवाः ॥ २० ॥ निःसृत्य जतुगेहाद् वै हिडिम्बात् पुरुषादकात् । यश्चैषामभवद् द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ २१ ॥ याज्ञसेनीमथो यत्र सिन्धुराजोऽपकृष्टवान् । तत्रैषामभवद् द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ २२ ॥ यश्च तान् संगतान् सर्वान् पाण्डवान् वारणावते । दह्यतो मोचयामास तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ २३ ॥
जिनके बल और पराक्रमसे चारों पाण्डव सहसा लाक्षाभवनसे निकलकर इस पृथ्वीपर जीवित बच गये, जिन्होंने मनुष्यभक्षी राक्षस हिडिम्बसे अपने भाइयोंकी रक्षा की, उस संकटके समय जो कुन्तीकुमार भीम इन पाण्डवोंके लिये द्वीपके समान आश्रयदाता हो गये, जब सिन्धुराज जयद्रथने द्रौपदीका अपहरण किया था, उस समय भी जिन कुन्तीकुमार वृकोदरने उन सबको द्वीपकी भाँति आश्रय दिया था तथा जिन्होंने वारणावत नगरमें एकत्र हुए समस्त पाण्डवोंको लाक्षागृहकी आगमें जलनेसे बचा लिया था, उन्हीं भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंके साथ युद्धकी तैयारी की है॥
कृष्णायां चरता प्रीतिं येन क्रोधवशा हताः । प्रविश्य विषमं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २४ ॥ यस्य नागायुतैर्वीर्यं भुजयोः सारमर्पितम् । तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ २५ ॥
जिन्होंने द्रौपदीपर अपना प्रेम जताते हुए अत्यन्त दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतकी भूमिमें प्रवेश करके क्रोधवश नामवाले राक्षसोंको मार डाला, जिनकी दोनों भुजाओंमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उन्हीं भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंपर आक्रमणका उद्योग किया है॥ २४-२५॥
कृष्णद्वितीयो विक्रम्य तुष्ट्यर्थं जातवेदसः । अजयद् यः पुरा वीरो युध्यमानं पुरंदरम् ॥ २६ ॥ यः स साक्षान्महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् । तोषयामास युद्धेन देवदेवमुमापतिम् ॥ २७ ॥ यश्च सर्वान् वशे चक्रे लोकपालान् धनुर्धरः । तेन वो विजयेनाजौ पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ २८ ॥