महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 461, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'उन्होंने मेरे लिये अनन्त क्लेश और दुःख सहन किये हैं।' नरश्रेष्ठ पिताजी! आपके पुत्रों तथा मेरे भाइयोंने केवल मेरी प्रसन्नताके लिये शत्रुओंको सदा ही सताया है; ये सब बातें आप पहलेसे ही जानते हैं॥ ते राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सामात्यस्य महारथाः। वैरं प्रतिकरिष्यन्ति कुलोच्छेदेन पाण्डवाः॥ १६॥ 'इसलिये वे महारथी पाण्डव मन्त्रियोंसहित महाराज धृतराष्ट्रके कुलका समूलोच्छेद करके अपने वैरका बदला लेंगे'॥ १६॥ ततो द्रोणोऽब्रवीद् भीष्मः कृपो द्रौणिश्च भारत। मत्वा मां महतीं चिन्तामास्थितं व्यथितेन्द्रियम्॥ १७॥ अभिद्रुग्धाः परे चेन्नो न भेतव्यं परंतप। असमर्थाः परे जेतुमस्मान् युधि समास्थितान्॥ १८॥ भारत! मेरी यह बात सुनकर आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाने मुझे बड़ी भारी चिन्तामें पड़कर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे व्यथित हुआ जान आश्वासन देते हुए कहा—'परंतप! यदि शत्रुपक्षके लोग हमसे द्रोह रखते हैं तो तुम्हें डरना नहीं चाहिये। शत्रुलोग युद्धमें उपस्थित होनेपर हमें जीतनेमें असमर्थ हैं॥ १७-१८॥ एकैकशः समर्थाः स्मो विजेतुं सर्वपार्थिवान्। आगच्छन्तु विनेष्यामो दर्पमेषां शितैः शरैः॥ १९॥ 'हममेंसे एक-एक वीर भी समस्त राजाओंको जीतनेकी शक्ति रखता है। शत्रुलोग आवें तो सही, हम अपने पैने बाणोंसे उनका घमंड चूर-चूर कर देंगे'॥ १९॥ पुरैकेन हि भीष्मेण विजिताः सर्वपार्थिवाः। मृते पितर्यतिक्रुद्धो रथेनैकेन भारत॥ २०॥ भारत! पहलेकी बात है, अपने पिता शान्तनुकी मृत्युके पश्चात् भीष्मजीने किसी समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर एकमात्र रथकी सहायतासे अकेले ही सब राजाओंको जीत लिया था॥ २०॥ जघान सुबहूंस्तेषां संरब्धः कुरुसत्तमः। ततस्ते शरणं जग्मुर्देवव्रतमिमं भयात्॥ २१॥ रोषमें भरे हुए कुरुश्रेष्ठ भीष्मने जब उनमेंसे बहुत-से राजाओंको मार डाला, तब वे डरके मारे पुनः इन्हीं देवव्रत (भीष्म)-की शरणमें आये॥ २१॥ स भीष्मः सुसमर्थोऽयमस्माभिः सहितो रणे। परान् विजेतुं तस्मात् ते व्येतु भीर्भरतर्षभ॥ २२॥ भरतश्रेष्ठ! वे ही पूर्ण सामर्थ्यशाली भीष्म युद्धमें शत्रुओंको जीतनेके लिये हमारे साथ हैं; अतः आपका भय दूर हो जाना चाहिये॥ २२॥ इत्येषां निश्चयो ह्यासीत् तत्कालेऽमिततेजसाम्।