भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 462

पुरा परेषां पृथिवी कृत्स्नाऽऽसीद् वशवर्तिनी ।। २३ ।। अस्मान् पुनरमी नाद्य समर्था जेतुमाहवे । छिन्नपक्षाः परे ह्यद्य वीर्यहीनाश्च पाण्डवाः ।। २४ ।। इन अमिततेजस्वी भीष्म आदिने उसी समय युद्धमें हमारा साथ देनेका दृढ़ निश्चय कर लिया था। पहले यह सारी पृथ्वी हमारे शत्रुओंके काबूमें थी, किंतु अब हमारे हाथमें आ गयी है। हमारे ये शत्रु अब हमें युद्धमें जीतनेकी शक्ति नहीं रखते। सहायकोंके अभावमें पाण्डव पंख कटे हुए पक्षीके समान असहाय एवं पराक्रमशून्य हो गये हैं ।। २३-२४ ।।

अस्मत्संस्था च पृथिवी वर्तते भरतर्षभ । एकार्थाः सुखदुःखेषु समानीताश्च पार्थिवाः ।। २५ ।। भरतश्रेष्ठ! इस समय यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें है। हमने जिन राजाओंको यहाँ बुलाया है, ये सब सुख और दुःखमें भी हमारे साथ एक-सा प्रयोजन रखते हैं—हमारे सुख-दुःखको अपना ही सुख-दुःख मानते हैं ।। २५ ।।

अप्यग्निं प्रविशेयुस्ते समुद्रं वा परंतप । मदर्थं पार्थिवाः सर्वे तद् विद्धि कुरुसत्तम ।। २६ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुरुश्रेष्ठ! निश्चित मानिये, ये सब समागत नरेश मेरे लिये जलती आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं और समुद्रमें भी कूद सकते हैं ।। २६ ।।

उन्मत्तमिव चापि त्वां प्रहसन्तीह दुःखितम् । विलपन्तं बहुविधं भीतं परविकत्थने ।। २७ ।। इतनेपर भी आप शत्रुओंकी मिथ्या प्रशंसा सुनकर पागल-से हो उठे हैं और दुःखी एवं भयभीत होकर नाना प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। यह सब देखकर ये राजालोग यहाँ हँस रहे हैं ।। २७ ।।

एषां ह्येकैकशो राज्ञां समर्थः पाण्डवान् प्रति । आत्मानं मन्यते सर्वो व्येतु ते भयमागतम् ।। २८ ।। इन राजाओंमेंसे प्रत्येक अपने-आपको पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ मानता है; अतः आपके मनमें जो भय आ गया है, वह निकल जाना चाहिये ।। २८ ।।

जेतुं समग्रं सेनां मे वासवोऽपि न शक्नुयात् । हन्तुंक्षय्यरूपेयं ब्रह्मणोऽपि स्वयम्भुवः ।। २९ ।। मेरी सम्पूर्ण सेनाको इन्द्र भी नहीं जीत सकते। स्वयम्भू ब्रह्माजी भी इसका नाश नहीं कर सकते ।।

युधिष्ठिरः पुरं हित्वा पञ्च ग्रामान् स याचति । भीतो हि मामकात् सैन्यात् प्रभावाच्चैव मे विभो ।। ३० ।। प्रभो! युधिष्ठिर तो मेरी सेना तथा प्रभावसे इतने डर गये हैं कि राजधानी या नगर लेनेकी बात छोड़कर अब पाँच गाँव माँगने लगे हैं ।। ३० ।।