भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 509

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना

दुर्योधन उवाच
सदृशानां मनुष्येषु सर्वेषां तुल्यजन्मनाम् ।
कथमेकान्ततस्तेषां पार्थानां मन्यसे जयम् ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**पितामह! मनुष्योंमें हम और पाण्डव शिक्षाकी दृष्टिसे समान हैं, हमारा जन्म भी एक ही कुलमें हुआ है; फिर आप यह कैसे मानते हैं कि युद्धमें एकमात्र कुन्तीकुमारोंकी ही विजय होगी ॥ १ ॥
वयं च तेऽपि तुल्या वै वीर्येण च पराक्रमैः ।
समेन वयसा चैव प्रातिभेन श्रुतेन च ॥ २ ॥
बल, पराक्रम, समवयस्कता, प्रतिभा और शास्त्रज्ञान—इन सभी दृष्टियोंसे हमलोग और पाण्डव समान ही हैं ॥
अस्त्रेण योधयुग्या च शीघ्रत्वे कौशले तथा ।
सर्वे स्म समजातीयाः सर्वे मानुषयोनयः ॥ ३ ॥
अस्त्र-बल, योद्धाओंके संग्रह, हाथोंकी फुर्ती तथा युद्धकौशलमें भी हम और वे एक-से ही हैं, सभी समान जातिके हैं और सब-के-सब मनुष्ययोनिमें ही उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥