महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपितामह विजानीषे पार्थेषु विजयं कथम् । नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च बाह्लिके ॥ ४ ॥ अन्येषु च नरेन्द्रेशु पराक्रम्य समारभे । दादाजी! ऐसी दशामें भी आप कैसे जानते हैं कि विजय कुन्तीपुत्रोंकी ही होगी। मैं, आप, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, बाह्लिक तथा अन्य राजाओंके पराक्रमका भरोसा करके युद्धका आरम्भ नहीं कर रहा हूँ॥ ४ १/२ ॥ अहं वैकर्तनः कर्णो भ्राता दुःशासनश्च मे ॥ ५ ॥ पाण्डवान् समरे पञ्च हनिष्यामः शितैः शरैः । मैं, विकर्तनपुत्र कर्ण तथा मेरा भाई दुःशासन—हम तीन ही मिलकर युद्धभूमिमें पाँचों पाण्डवोंको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालेंगे॥ ५ १/२ ॥ ततो राजन् महायज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः ॥ ६ ॥ ब्राह्मणांस्तर्पयिष्यामि गोभिरश्वैर्धनेन च । राजन्! तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाले विविध महायज्ञोंका अनुष्ठान करके गायें, घोड़े और धन दानमें देकर ब्राह्मणोंको तृप्त करूँगा॥ ६ १/२ ॥