महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 557, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन पर्यायोऽस्ति यत् साम्यं त्वयि कुर्युर्विशाम्पते । बलवत्तां हि मन्यन्ते भीष्मद्रोणकृपादिभिः ॥ ७ ॥ अतः प्रजानाथ! ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे (वे आपको आधा राज्य देकर) आपके प्रति समता (सन्धि) स्थापित करें। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि उनके पक्षमें हैं, इसलिये वे अपनेको आपसे अधिक बलवान् समझते हैं ॥ ७ ॥
यावच्च मार्दवेनैतान् राजन्नुपचरिष्यसि । तावदेते हरिष्यन्ति तव राज्यमरिंदम ॥ ८ ॥ अतः शत्रुदमन राजन्! जबतक आप इनके साथ नर्मीका बर्ताव करेंगे, तबतक ये आपके राज्यका अपहरण करनेकी ही चेष्टा करेंगे ॥ ८ ॥
नानुक्रोशान्न कार्पण्यान्न च धर्मार्थकारणात् । अलं कर्तुं धार्तराष्ट्रास्तव काममरिंदम ॥ ९ ॥ शत्रुमर्दन नरेश! आप यह न समझें कि धृतराष्ट्रके पुत्र आपपर कृपा करके या अपनेको दीन-दुर्बल मानकर अथवा धर्म एवं अर्थकी ओर दृष्टि रखकर आपका मनोरथ पूर्ण कर देंगे ॥ ९ ॥
एतदेव निमित्तं ते पाण्डवास्तु यथा त्वयि । नान्वतप्यन्त कौपीनं तावत् कृत्वापि दुष्करम् ॥ १० ॥ पाण्डुनन्दन! कौरवोंके सन्धि न करनेका सबसे बड़ा कारण या प्रमाण तो यही है कि उन्होंने आपको कौपीन धारण कराकर तथा उतने दीर्घकालतकके लिये वनवासका दुष्कर कष्ट देकर भी कभी इसके लिये पश्चात्ताप नहीं किया ॥ १० ॥
पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य च धीमतः । ब्राह्मणानां च साधूनां राज्ञश्च नगरस्य च ॥ ११ ॥ पश्यतां कुरुमुख्यानां सर्वेषामेव तत्त्वतः । दानशीलं मृदुं दान्तं धर्मशीलमनुव्रतम् ॥ १२ ॥ यत् त्वामुपधिना राजन् द्यूते वञ्चितवांस्तदा । न चापत्रपते तेन नृशंसः स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥ राजन्! आप दानशील, कोमलस्वभाव, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, स्वभावतः धर्मपरायण तथा सबके हैं, तो भी क्रूर दुर्योधनने उस समय पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, बुद्धिमान् विदुर, साधु, ब्राह्मण, राजा धृतराष्ट्र, नगरनिवासी जनसमुदाय तथा कुरुकुलके सभी श्रेष्ठ पुरुषोंके देखते-देखते आपको जूएम छलसे ठग लिया और अपने उस कुकृत्यके लिये वह अबतक लज्जाका अनुभव नहीं करता है ॥ ११—१३ ॥
तथाशीलसमाचारे राजन् मा प्रणयं कृथाः । वध्यास्ते सर्वलोकस्य किं पुनस्तव भारत ॥ १४ ॥