महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 558, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! ऐसे कुटिलस्वभाव और खोटे आचरणवाले दुर्योधनके प्रति आप प्रेम न दिखावें। भारत! धृतराष्ट्रके वे पुत्र तो सभी लोगोंके वध्य हैं; फिर आप उनका वध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ १४ ॥ वाग्भिस्त्वप्रतिरूपाभिरतुदत् त्वां सहानुजम् । श्लाघमानः प्रहृष्टः सन् भ्रातृभिः सह भाषते ॥ १५ ॥ एतावत् पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम् । नामधेयं च गोत्रं च तदप्येषां न शिष्यते ॥ १६ ॥ (क्या आप वह दिन भूल गये, जब कि) दुर्योधनने भाइयोंसहित आपको अपने अनुचित वचनोंद्वारा मार्मिक पीड़ा पहुँचायी थी। वह अत्यन्त हर्षसे फूलकर अपनी मिथ्या प्रशंसा करता हुआ अपने भाइयोंके साथ कहता था—'अब पाण्डवोंके पास इस संसारमें 'अपनी' कहनेके लिये इतनी-सी भी कोई वस्तु नहीं रह गयी है। केवल नाम और गोत्र बचा है, परंतु वह भी शेष नहीं रहेगा' ॥ १५-१६ ॥ कालेन महता चैषां भविष्यति पराभवः । प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतयो मयि ॥ १७ ॥ 'दीर्घकालके पश्चात् इनकी भारी पराजय होगी। इनकी स्वाभाविक शूरता-वीरता आदि नष्ट हो जायगी और ये मेरे पास ही प्राणत्याग करेंगे' ॥ १७ ॥ दुःशासनेन पापेन तदा द्यूते प्रवर्तिते । अनाथवत् तदा देवी द्रौपदी सुदुरात्मना ॥ १८ ॥ आकृष्य केशे रुदती सभायां राजसंसदि । भीष्मद्रोणप्रमुखतो गौरिति व्याहृता मुहुः ॥ १९ ॥ उन दिनों जब जूएका खेल चल रहा था, अत्यन्त दुरात्मा पापी दुःशासन अनाथकी भाँति रोती-कलपती हुई महारानी द्रौपदीको उनके केश पकड़कर राजसभामें घसीट लाया और भीष्म तथा द्रोणाचार्य आदिके समक्ष उसने उनका उपहास करते हुए बारंबार उसे 'गाय' कहकर पुकारा ॥ १८-१९ ॥ भवता वारिताः सर्वे भ्रातरो भीमविक्रमाः । धर्मपाशनिबद्धाश्च न किंचित् प्रतिपेदिरे ॥ २० ॥ यद्यपि आपके भाई भयंकर पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ थे, तथापि आपने इन्हें रोक दिया, इसलिये धर्मबन्धनमें बँधे होनेके कारण ये उस समय उस अन्यायका कुछ भी प्रतीकार न कर सके ॥ २० ॥ एताश्चान्याश्च परुषा वाचः स समुदीरयन् । श्लाघते ज्ञातिमध्ये स्म त्वयि प्रव्रजिते वनम् ॥ २१ ॥ जब आप वनकी ओर जाने लगे, उस समय भी वह बन्धु-बान्धवोंके बीचमें ऊपर कही हुई तथा और भी बहुत-सी कठोर बातें कहकर अपनी प्रशंसा करता रहा ॥ २१ ॥