महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 559, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंये तत्रासन् समानीतास्ते दृष्ट्वा त्वामनागसम् । अश्रुकण्ठा रुदन्तश्च सभायामासते तदा ॥ २२ ॥ जो लोग वहाँ बुलाये गये थे, वे सभी नरेश आपको निरपराध देखकर रोते और आँसू बहाते हुए रुँधे हुए कण्ठसे उस समय चुपचाप सभामें बैठे रहे ॥ २२ ॥
न चैनमभ्यनन्दंस्ते राजानो ब्राह्मणैः सह । सर्वे दुर्योधनं तत्र निन्दन्ति स्म सभासदः ॥ २३ ॥ ब्राह्मणोंसहित उन राजाओंने वहाँ दुर्योधनकी प्रशंसा नहीं की। उस समय सभी सभासद् उसकी निन्दा ही कर रहे थे ॥ २३ ॥
कुलीनस्य च या निन्दा वधो वामित्रकर्शन । महागुणो वधो राजन् न तु निन्दा कुजीविका ॥ २४ ॥ शत्रुसूदन! कुलीन पुरुषकी निन्दा हो या वध—इनमेंसे वध ही उसके लिये अत्यन्त गुणकारक है; निन्दा नहीं। निन्दा तो जीवनको घृणित बना देती है ॥ २४ ॥
तदैव निहतो राजन् यदैव निरपत्रपः । निन्दितश्च महाराज पृथिव्यां सर्वराजभिः ॥ २५ ॥ महाराज! जब इस भूमण्डलके सभी राजाओंने निन्दा की, उसी समय उस निर्लज्ज दुर्योधनकी एक प्रकारसे मृत्यु हो गयी ॥ २५ ॥
ईषत् कार्यो वधस्तस्य यस्य चारित्रमीदृशम् । प्रस्कन्देन प्रतिस्तब्धश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ २६ ॥ जिसका चरित्र इतना गिरा हुआ है, उसका वध करना तो बहुत साधारण कार्य है। जिसकी जड़ कट गयी हो और जो गोल वेदीके आधारपर खड़ा हो, उस वृक्षकी भाँति दुर्योधनके भी धराशायी होनेमें अब अधिक विलम्ब नहीं है ॥ २६ ॥
वध्यः सर्प इवानार्यः सर्वलोकस्य दुर्मतिः । जह्येनं त्वममित्रघ्न मा राजन् विचिकित्सिथाः ॥ २७ ॥ खोटी बुद्धिवाला दुराचारी दुर्योधन दुष्ट सर्पकी भाँति सब लोगोंके लिये वध्य है। शत्रुओंका नाश करनेवाले महाराज! आप दुविधामें न पड़ें, इस दुष्टको अवश्य मार डालें ॥ २७ ॥
सर्वथा त्वत्क्षमं चैतद् रोचते च ममानघ । यत् त्वं पितरि भीष्मे च प्रणिपातं समाचरेः ॥ २८ ॥ निष्पाप नरेश! आप जो पितृतुल्य धृतराष्ट्र तथा पितामह भीष्मके प्रति प्रणाम एवं नम्रतापूर्ण बर्ताव करते हैं, वह सर्वथा आपके योग्य है। मैं भी इसे पसंद करता हूँ ॥ २८ ॥
अहं तु सर्वलोकस्य गत्वा छेत्स्यामि संशयम् । येषामस्ति द्विधाभावो राजन् दुर्योधनं प्रति ॥ २९ ॥