भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 652

महापुरुषोंका कहना है कि अन्तिम (सुख-दुःखसे अतीत) स्थितिकी प्राप्ति ही वास्तविक सुख है तथा सुख-दुःखके बीचकी स्थिति ही दुःख है ।। ९६-९७ ।। अभिवादयन्ति भवतीं पाण्डवाः सह कृष्णया । आत्मानं च कुशलिनं निवेद्याहुरनामयम् ।। ९८ ।। बुआ! द्रौपदीसहित पाण्डवोंने तुम्हें प्रणाम कहलाया है और अपनेको सकुशल बताकर अपनी स्वस्थता भी सूचित की है ।। ९८ ।। अरोगान् सर्वसिद्धार्थान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवान् । ईश्वरान् सर्वलोकस्य हतामित्रान् श्रिया वृतान् ।। ९९ ।। तुम शीघ्र ही देखोगी; पाण्डव नीरोग अवस्थामें तुम्हारे सामने उपस्थित हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो गये हैं और वे अपने शत्रुओंका संहार करके साम्राज्य-लक्ष्मीसे संयुक्त हो सम्पूर्ण जगत्के शासकपदपर प्रतिष्ठित हैं ।। ९९ ।। एवमाश्वासिता कुन्ती प्रत्युवाच जनार्दनम् । पुत्रादिभिरभिध्वस्ता निगृह्याबुद्धिजं तमः ।। १०० ।। इस प्रकार आश्वासन पाकर पुत्रों आदिसे दूर पड़ी हुई कुन्तीदेवीने अज्ञानजनित मोहका निरोध करके भगवान् जनार्दनसे कहा ।। १०० ।।

कुन्त्युवाच

यद् यत् तेषां महाबाहो पथ्यं स्यान्मधुसूदन । यथा यथा त्वं मन्येथाः कुर्याः कृष्ण तथा तथा ।। १०१ ।। कुन्ती बोली—महाबाहु मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो पाण्डवोंके लिये हितकर हो तथा जैसे-जैसे कार्य करना तुम्हें उचित जान पड़े, वैसे-वैसे करो ।। १०१ ।। अविलोपेन धर्मस्य अनिकृत्या परंतप । प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण सत्यस्याभिजनस्य च ।। १०२ ।। परंतप श्रीकृष्ण! धर्मका लोप न करते हुए, छल और कपटसे दूर रहकर समयोचित कार्य करना चाहिये। मैं तुम्हारी सत्यपरायणता और कुल-मर्यादाका भी प्रभाव जानती हूँ ।। १०२ ।। व्यवस्थायां च मित्रेषु बुद्धिविक्रमयोस्तथा । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं तपो महत् ।। १०३ ।। त्वं त्राता त्वं महद् ब्रह्म त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । यथैवात्थ तथैवैतत् त्वयि सत्यं भविष्यति ।। १०४ ।। प्रत्येक कार्यकी व्यवस्थामें, मित्रोंके संग्रहमें तथा बुद्धि और पराक्रममें भी जो तुम्हारा अद्भुत प्रभाव है, उससे मैं परिचित हूँ। हमारे कुलमें तुम्हीं धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो, तुम्हीं