भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 653

महान् तप हो, तुम्हीं रक्षक और तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा हो। सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है। तुम जो कुछ कहते हो, वह सब तुम्हारे संनिधानमें सत्य होकर ही रहेगा ।। १०३-१०४ ।।

(कुरूणां पाण्डवानां च लोकानां चापराजित ।
सर्वस्यैतस्य वार्ष्णेय गतिस्त्वमसि माधव ।।
प्रभावो बुद्धिवीर्यं च तादृशं तव केशव ।)

किसीसे पराजित न होनेवाले वृष्णिनन्दन माधव! कौरवोंके, पाण्डवोंके तथा इस सम्पूर्ण जगत्‌के तुम्हीं आश्रय हो। केशव! तुम्हारा प्रभाव तथा तुम्हारा बुद्धिबल भी तुम्हारे अनुरूप ही है।

वैशम्पायन उवाच
तामामन्त्र्य च गोविन्दः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।
प्रातिष्ठत महाबाहुर्दुर्योधनगृहान् प्रति ।। १०५ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर महाबाहु गोविन्द कुन्तीदेवीकी परिक्रमा करके उनसे आज्ञा ले दुर्योधनके घरकी ओर चल दिये ।। १०५ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कृष्णकुन्तीसंवादे
नवतितमोऽध्यायः ।। ९० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्ण-कुन्ती-
संवादविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९० ।।

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १½ श्लोक मिलाकर कुल १०६½ श्लोक हैं।]