महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 695, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'इसी प्रकार पूछते हुए वे राजा दम्भोद्भव महान् गर्वसे उन्मत्त हो दूसरे किसीको कुछ भी न समझते हुए इस पृथ्वीपर विचरने लगे ।। ८ ।।
तं च वैद्या अकृपणा ब्राह्मणाः सर्वतोऽभयाः । प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुनः पुनः ॥ ९ ॥ 'उस समय सर्वथा निर्भय, उदार एवं विद्वान् ब्राह्मणोंने बारंबार आत्मप्रशंसा करनेवाले उन नरेशको मना किया ।।
निषिध्यमानोऽप्यसकृत् पृच्छत्येव स वै द्विजान् । अतिमानं श्रिया मत्तं तमूचुर्ब्राह्मणास्तदा ॥ १० ॥ तपस्विनो महात्मानो वेदप्रत्ययदर्शिनः । उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातयः ॥ ११ ॥ 'उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार-बार प्रश्न करते ही रहे। उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे धन-वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे। राजाको यही (बारंबार) प्रश्न दोहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले- ।। १०-११ ।।
अनेकजयिनौ संख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ । तयोस्त्वं न समो राजन् भवितासि कदाचन ॥ १२ ॥ 'राजन्! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्धमें अनेक योद्धाओंपर विजय पायी है। तुम कभी उनके समान न हो सकोगे' ।। १२ ।।
एवमुक्तः स राजा तु पुनः पप्रच्छ तान् द्विजान् । क्व तौ वीरौ क्वजन्मानौ किंकर्माणौ च कौ च तौ ॥ १३ ॥ 'उनके ऐसा कहनेपर राजाने पुनः उन ब्राह्मणोंसे पूछा-'वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म किस स्थानमें हुआ है? उनके कर्म कौन-कौन-से हैं और उनके नाम क्या हैं?' ।। १३ ।।
ब्राह्मणा ऊचुः
नरो नारायणश्चैव तापसाविति नः श्रुतम् । आयातौ मानुषे लोके ताभ्यां युध्यस्व पार्थिव ॥ १४ ॥ ब्राह्मण बोले- भूपाल! हमने सुना है कि वे नर-नारायण नामवाले तपस्वी हैं और इस समय मनुष्यलोकमें आये हैं। तुम उन्हीं दोनोंके साथ युद्ध करो ।। १४ ।।
श्रूयेते तौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ । तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने ॥ १५ ॥ सुना है, वे दोनों महात्मा नर और नारायण गन्धमादन पर्वतपर ऐसी घोर तपस्या कर रहे हैं, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता ।। १५ ।।