महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 696, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंस राजा महतीं सेनां योजयित्वा षडङ्गिनीम् । अमृष्यमाणः सम्प्रायाद् यत्र तावपराजितौ ॥ १६ ॥ राजाको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने (रथ, हाथी, घोड़े, पैदल, शकट और ऊँट—इन) छः अंगोंसे युक्त विशाल सेनाको सुसज्जित करके उस स्थानकी यात्रा की, जहाँ कभी पराजित न होनेवाले वे दोनों महात्मा विद्यमान थे ॥ १६ ॥
स गत्वा विषमं घोरं पर्वत गन्धमादनम् । मार्गमाणोऽन्वगच्छत् तौ तापसौ वनमाश्रितौ ॥ १७ ॥ राजा उनकी खोज करते हुए दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतपर गये और वनमें स्थित उन तपस्वी महात्माओंके पास जा पहुँचे ॥ १७ ॥
तौ दृष्ट्वा क्षुत्पिपासाभ्यां कृशौ धमनिसंततौ । शीतवातातपैश्चैव कर्षितौ पुरुषोत्तमौ ॥ १८ ॥ वे दोनों पुरुषरत्न भूख-प्याससे दुर्बल हो गये थे। उनके सारे अंगोंमें फैली हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। वे सर्दी-गरमी और हवाका कष्ट सहते-सहते अत्यन्त कृशकाय हो रहे थे ॥ १८ ॥
अभिगम्योपसंगृह्य पर्यपृच्छदनामयम् । तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च ॥ १९ ॥ न्यमन्त्रयेतां राजानं किं कार्यं क्रियतामिति । ततस्तामानुपूर्वीं स पुनरेवान्वकीर्तयत् ॥ २० ॥ निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्भवने उन दोनोंका कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायणने राजाका स्वागत-सत्कार करके आसन, जल और फल-मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तदनन्तर पूछा कि हम आपकी क्या सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरशः सुना दिया ॥ १९-२० ॥