भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

यत् प्राप्य सुरतां प्राप्ताः सुराः सुरपतेः सखे ॥ १४ ॥ महेन्द्रमित्र! देखो, यह वरुणदेवताका भवन है, जो सब ओरसे सुवर्णका ही बना हुआ है। यहाँ पहुँचकर ही देवगण वास्तवमें देवत्वलाभ करते हैं॥ १४ ॥

एतानि हृतराज्यानां दैतेयानां स्म मातले। दीप्यमानानि दृश्यन्ते सर्वप्रहरणान्युत ॥ १५ ॥ मातले! जिनके राज्य छीन लिये गये हैं, उन दैत्योंके ये देदीप्यमान सम्पूर्ण आयुध दिखायी देते हैं॥ १५ ॥

अक्षयाणि किलैतानि विवर्तन्ते स्म मातले । अनुभावप्रयुक्तानि सुरैरवजितानि ह ॥ १६ ॥ देवसारथे! ये सारे अस्त्र-शस्त्र अक्षय हैं और प्रहार करनेपर शत्रुको आहत करके पुनः अपने स्वामीके हाथमें लौट आते हैं। पहले दैत्यलोग अपनी शक्तिके अनुसार इनका प्रयोग करते थे, परंतु अब देवताओंने इन्हें जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया है॥ १६ ॥

अत्र राक्षसजात्यश्च दैत्यजात्यश्च मातले । दिव्यप्रहरणाश्चासन् पूर्वदैवतनिर्मिताः ॥ १७ ॥ मातले! इन स्थानोंमें राक्षस और दैत्यजातिके लोग रहते हैं। यहाँ दैत्योंके बनाये हुए बहुत-से दिव्यास्त्र भी रहे हैं॥ १७ ॥

अग्निरेष महार्षिष्माञ्जागर्ति वारुणे हृदे । वैष्णवं चक्रमाविद्धं विधूमेन हविष्मता ॥ १८ ॥ ये महातेजस्वी अग्निदेव वरुणदेवताके सरोवरमें प्रकाशित होते हैं। इन धूमरहित अग्निदेवने भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रको भी अवरुद्ध कर दिया था॥ १८ ॥

एष गाण्डीमयश्चापो लोकसंहारसम्भृतः । रक्ष्यते दैवतैर्नित्यं यतस्तद् गाण्डिवं धनुः ॥ १९ ॥ वज्रकी गाँठको 'गाण्डी' कहा गया है। यह धनुष उसीका बना हुआ है, इसलिये गाण्डीव कहलाता है। जगत्‌का संहार करनेके लिये इसका निर्माण हुआ है। देवतालोग सदा इसकी रक्षा करते हैं॥ १९ ॥

एष कृत्ये समुत्पन्ने तत् तद् धारयते बलम् । सहस्रशतसंख्येन प्राणेन सततं ध्रुवः ॥ २० ॥ यह धनुष आवश्यकता पड़नेपर लाखगुणी शक्तिसे सम्पन्न हो वैसे-वैसे ही बलको भी धारण करता है और सदा अविचल बना रहता है॥ २० ॥

अशास्यानपि शास्त्येष रक्षोबन्धुषु राजसु । सृष्टः प्रथमतश्चण्डो ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥ ब्रह्मवादी ब्रह्माजीने पहले इस प्रचण्ड धनुषका निर्माण किया था। यह राक्षसदृश राजाओंमेंसे अदम्य नरेशोंका भी दमन कर डालता है॥ २१ ॥