महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 710, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतच्छस्त्रं नरेन्द्रणां महच्चक्रेण भासितम् । पुत्राः सलिलराजस्य धारयन्ति महोदयम् ॥ २२ ॥ यह धनुष राजाओंके लिये एक महान् अस्त्र है और चक्रके समान उद्भासित होता रहता है। इस महान् अभ्युदयकारी धनुषको जलेश वरुणके पुत्र धारण करते हैं ॥ २२ ॥ एतत् सलिलराजस्यच्छत्रं छत्रगृहे स्थितम् । सर्वतः सलिलं शीतं जीमूत इव वर्षति ॥ २३ ॥ और यह सलिलराज वरुणका छत्र है, जो छत्रगृहमें रखा हुआ है। यह छत्र मेघकी भाँति सब ओरसे शीतल जल बरसाता रहता है ॥ २३ ॥ एतच्छत्रात् परिभ्रष्टं सलिलं सोमनिर्मलम् । तमसा मूर्च्छितं भाति येन नार्च्छति दर्शनम् ॥ २४ ॥ इस छत्रसे गिरा हुआ चन्द्रमाके समान निर्मल जल अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, जिससे दृष्टिपथमें नहीं आता है ॥ २४ ॥ बहून्यद्भुतरूपाणि द्रष्टव्यानीह मातले । तव कार्यावरोधस्तु तस्माद् गच्छाव मा चिरम् ॥ २५ ॥ मातले! इस वरुणलोकमें देखनेयोग्य बहुत-सी अद्भुत वस्तुएँ हैं; परंतु सबको देखनेसे तुम्हारे कार्यमें रुकावट पड़ेगी, इसलिये हमलोग शीघ्र ही यहाँसे नागलोकमें चलें ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥